ग़ज़ल

पुश्त-ए-पा मारी बस-कि दुनिया पर

पुश्त-ए-पा मारी बस-कि दुनिया पर

यह ग़ज़ल जीवन के संघर्षों और दुनिया के छल-कपट पर आधारित है। शायर बताते हैं कि वह दुनिया की चुनौतियों और दर्द से गुज़र चुके हैं, और प्रेम के गहरे अनुभवों ने उन्हें जीवन की अस्थिरता का अहसास कराया है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
पुश्त-ए-पा मारी बस-कि दुनिया पर ज़ख़्म पड़ पड़ गया मिरे पा पर
मेरे पैरों का रास्ता, मेरी वंशावली, दुनिया पर पड़ते घावों से क्षतिग्रस्त हो गया है।
2
डूबे उछले है आफ़्ताब हनूज़ कहीं देखा था तुझ को दरिया पर
डूबे-उछले है आफ़ताब हनूज़, कहीं देखा था तुझ को दरिया पर। (अर्थात्: सूरज डूबकर उछला है, और कहीं पर मैंने तुम्हें नदी के किनारे देखा था।)
3
गिरो मय हूँ आओ शैख़ शहर अब्र झूमा ही जाहे सहरा पर
मैं वह भ्रमपूर्ण 'अहम्' हूँ, आओ शहर के शेख, कि बादल वास्तव में रेगिस्तान पर नचावे।
4
दिल-ए-पुर-ख़ूँ तो था गुलाबी शराब जी ही अपना चला न सहबा पर
दिल-ए-पुर-ख़ूँ का मतलब है ऐसा दिल जो शराब के नशे से भरा हुआ हो, और यह पंक्तियाँ कह रही हैं कि वह दिल अपने साथी के बिना नहीं रह सकता।
5
याँ जहाँ में कि शहर-ए-गोराँ है सात पर्दे हैं चश्म-ए-बीना पर
कवि कह रहे हैं कि जिस जगह को गोरा शहर कहते हैं, वहाँ दृष्टिहीन की आँखों पर सात परदे हैं।
6
फ़ुर्सत-ए-ऐश अपनी यूँ गुज़री कि मुसीबत पड़ी तमन्ना पर
ऐशो-आराम का खाली समय यूँ बीता कि मुसीबत इच्छा पर आ पड़ी।
7
तारुम-ए-ताक से लहू टपका संग-बाराँ हुआ है मीना पर
तारुम-ए-ताक से लहू टपका, यानी मेहराब के हार से खून टपका। संग-बाराँ हुआ है मीना पर, जिसका अर्थ है कि चूड़ी पर एक मिश्रण हो गया है।
8
'मीर' क्या बात उस के होंटों की जीना दूभर हुआ मसीहा पर
हे मीर, उसके होठों में क्या बात है कि मसीहा के लिए भी जीना मुश्किल हो गया है।
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