गिरो मय हूँ आओ शैख़ शहर — मीर तक़ी मीर
गिरो मय हूँ आओ शैख़ शहर
अब्र झूमा ही जाहे सहरा पर
“I am the illusory self, come, O Sheikh of the city, Let the cloud dance over the desert, indeed.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मैं वह भ्रमपूर्ण 'अहम्' हूँ, आओ शहर के शेख, कि बादल वास्तव में रेगिस्तान पर नचावे।
विस्तार
देखिए, शायर जी यहाँ एक गहरे सफर की बात कर रहे हैं। 'मैं हूँ, आओ'—यह एक तरह का सहारा है, एक निमंत्रण! और दूसरी पंक्ति बताती है कि जीवन में कितनी भी उदासी या वीरानगी क्यों न हो, प्रकृति का जादू हमेशा होता है। यह शेर हमें सिखाता है कि जब सब कुछ बिखर जाए, तब भी एक सहारा मिल जाता है... और वह सहारा ही सबसे बड़ी खूबसूरती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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