ग़ज़ल
दिल के तीं आतिश-ए-हिज्राँ से बचाया न गया
दिल के तीं आतिश-ए-हिज्राँ से बचाया न गया
यह ग़ज़ल विरह की आग से हृदय को बचाने की असंभवता पर केंद्रित है। शायर कहते हैं कि दिल को विरह की लपटों से बचाया नहीं जा सका, न घर को जलने से, और न ही दिल में कोई स्थायी ठिकाना बनाया जा सका। यह प्रेम की गहनता और नियति के सामने आशिक़ की लाचारी को दर्शाती है।
गीत सुनें
1
दिल के तीं आतिश-ए-हिज्राँ से बचाया न गया
घर जला सामने पर हम से बुझाया न गया
दिल को बिछोह की आग से बचाया नहीं जा सका, पर सामने घर के जलने पर भी मन से बुझाया नहीं जा सका।
2
दिल में रह-ए-दिल में कि मे'मार-ए-क़ज़ा से अब तक
ऐसा मतबू-ए-मकाँ कोई बनाया न गया
दिल के भीतर, दिल के मार्ग में, क़ज़ा के वास्तुकार से अब तक, ऐसा कोई निवास स्थान का ढाँचा नहीं बनाया गया।
3
कभू आशिक़ का तिरे जबहे से नाख़ुन का ख़राश
ख़त-ए-तक़्दीर के मानिंद मिटाया न गया
किसी आशिक़ के तिरे माथे से नाखून की खरोंच, कभी भी भाग्य के पत्र के समान मिटाई नहीं जा सकती।
4
क्या तुनुक-हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आह
एक दम राज़-ए-मोहब्बत का छुपाया न गया
क्या हिम्मत थी कि तुमने अपनी आँखों और दिल से आह भरकर, प्यार का राज़ एक पल के लिए भी छुपा नहीं पाए।
5
दिल जो दीदार का क़ातिल के बहुत भूका था
उस सितम-कुश्ता से इक ज़ख़्म भी खाया न गया
जब दिल प्रिय के दर्शन को बहुत भूखा था, तब भी उस कष्ट देने वाले से एक ज़ख्म भी नहीं खाया गया।
6
मैं तो था सैद-ए-ज़बूँ सैद-गह-ए-इश्क़ के बीच
आप को ख़ाक में भी ख़ूब मिलाया न गया
मैं तो वाणी के स्वामी और प्रेम के स्वामी के बीच था, फिर भी आपको धूल में भी मुझसे अच्छी तरह मिलाया नहीं गया।
7
शहर-ए-दिल-ए-आह अजब जाए थी पर उस के गए
ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया न गया
दिल का शहर, एक अजीब सफर था, पर उसके चले जाने से यह इतना उजाड़ हो गया कि इसे किसी तरह बसाया नहीं जा सका।
8
आज रुकती नहीं ख़ामे की ज़बाँ रखिए मुआ'फ़
हर्फ़ का तूल भी जो मुझ से घटाया न गया
आज क़लम की ज़बान रुक नहीं रही है, मुझे माफ़ कर दीजिए, क्योंकि मैं एक अक्षर की लंबाई भी कम नहीं कर सका।
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