आज रुकती नहीं ख़ामे की ज़बाँ रखिए मुआ'फ़ — मीर तक़ी मीर

आज रुकती नहीं ख़ामे की ज़बाँ रखिए मुआ'फ़ हर्फ़ का तूल भी जो मुझ से घटाया न गया

“Today, the tongue of accusation does not stop; keep your pardon, for even the pen stroke of a letter could not be diminished from me.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

आज क़लम की ज़बान रुक नहीं रही है, मुझे माफ़ कर दीजिए, क्योंकि मैं एक अक्षर की लंबाई भी कम नहीं कर सका।

विस्तार

यह शेर एक कवि की अपने शब्दों की लंबाई के लिए दिल से माफ़ी व्यक्त करता है। वे कहते हैं कि आज उनकी कलम की 'ज़ुबान' बेकाबू होकर बह रही है, जो रुक नहीं पा रही और न ही शब्दों को छोटा कर पा रही है। ऐसा लगता है जैसे उनके भीतर की भावनाएँ या विचार इतने प्रबल हैं कि वे उन्हें कम शब्दों में समेट नहीं पा रहे, चाहे वे कितनी भी कोशिश करें। कवि क्षमा मांगते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि उनका भाव शायद जितना चाहा गया था, उससे ज़्यादा लंबा हो गया है, लेकिन यह उनके दिल का एक अनियंत्रित उद्गार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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