ग़ज़ल
क्या क्या बैठे बिगड़ बिगड़ तुम पर हम तुम से बनाए गए
क्या क्या बैठे बिगड़ बिगड़ तुम पर हम तुम से बनाए गए
यह ग़ज़ल एक प्रेम संबंध में उपेक्षा और भावनात्मक आघात की भावना को दर्शाती है, जहाँ वक्ता को लगता है कि उसे धोखा दिया गया है। वक्ता यह कहता है कि वह प्रियजन के कारण बिगड़ गया है और उसे बार-बार झूठी बातों और धोखे का शिकार होना पड़ा है।
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1
क्या क्या बैठे बिगड़ बिगड़ तुम पर हम तुम से बनाए गए
चुपके बातें उठाए गए सर गाड़े वो हैं आए गए
क्या-क्या बातें बिगड़ गईं तुम पर, हम तो तुमसे ही बनाए गए हैं। चुपके-चुपके बातें उठाए गए, सिर गाड़े वो हैं, आए गए।
2
उट्ठे नक़ाब जहाँ से यारब जिस से तकल्लुफ़ बीच में है
जब निकले उस राह से हो कर मुँह तुम हम से छुपाए गए
शायर कह रहा है कि जहाँ से नक़ाब उठेगा, जहाँ बात में झिझक है, जब तुम उस रास्ते से गुज़रकर अपना मुँह हमसे छिपा लोगे, तब हम अकेले रह जाएँगे।
3
कब कब तुम ने सच नहीं मानीं झूटी बातें ग़ैरों की
तुम हम को यूँ ही जलाए गए वे तुम को वो हैं लगाए गए
जब-जब तुमने ग़ैरों की झूठी बातें सच नहीं मानीं, और जब-जब हम को यूँ ही जलाए गए, और जब-जब तुम को वो हैं लगाए गए।
4
सुब्ह वो आफ़त उठ बैठा था तुम ने न देखा सद अफ़्सोस
क्या क्या फ़ित्ने सर जोड़े पलकों के साए साए गए
सुबह वो आफ़त उठ बैठा था तुम ने न देखा, क्या सद अफ़सोस। क्या क्या फ़ितने सर जोड़े पलकों के साए साए गए।
(अर्थात्, सुबह के समय एक विपत्ति खड़ी हो गई, जिसे तुमने नहीं देखा, कितना गहरा अफसोस है। तुम्हारी पलकों की परछाइयों ने कितने-कितने छल और मुसीबतें बुन डालीं।)
5
अल्लाह रे ये दीदा-दराई हूँ न मुकद्दर क्यूँके हम
आँखें हम से मिलाए गए फिर ख़ाक में हम को मिलाए गए
अल्लाह रे, ये दीदा-दराई हूँ न मुकद्दर क्योंके हम, आँखें हम से मिलाए गए फिर ख़ाक में हम को मिलाए गए। हे अल्लाह, यह दृश्य मुझे डराता है, लेकिन क्यों, हे तकदीर, आपने हमें आँखें दिखाकर मिलाया, और फिर हमें मिट्टी में मिला दिया।
6
आग में ग़म की हो के गुदाज़ाँ जिस्म हुआ सब पानी सा
या'नी बिन इन शोला-रुख़ों के ख़ूब ही हम भी ताए गए
आग के ग़म से गुदाज़ा जिस्म पानी जैसा हो गया, मतलब इन शोला-रुख़ों के बिना मेरी ख़ूबसूरती भी फीकी पड़ गई।
7
टुकड़े टुकड़े करने की भी हद एक आख़िर होती है
कुश्ते उस की तेग़-ए-सितम के गोर तईं कब लाए गए
टुकड़े-टुकड़े करने की भी एक सीमा होती है; उस क्रूर अत्याचार की तलवार की आँखों को यह संघर्ष कब शांति दिलाएगा।
8
ख़िज़्र जो मिल जाता है गाहे आप को भूला ख़ूब नहीं
खोए गए उस राह के वर्ना काहे को फिर पाए गए
अगर किसी को खिज्र मिल जाए, तो वे आपको आसानी से नहीं भूलेंगे; नहीं तो, खोने के बाद वे आपको फिर क्यों ढूंढेंगे।
9
मरने से क्या 'मीर'-जी-साहब हम को होश थे क्या करिए
जी से हाथ उठाए गए पर उस से दिल न उठाए गए
मरने से क्या 'मीर'-जी-साहब हम को होश थे क्या करिए। जी से हाथ उठाए गए पर उस से दिल न उठाए गए।
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