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टुकड़े टुकड़े करने की भी हद एक आख़िर होती है
कुश्ते उस की तेग़-ए-सितम के गोर तईं कब लाए गए

There is a limit even to tearing into pieces; When will the eyes of your cruel oppression bring rest to this struggle?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

टुकड़े-टुकड़े करने की भी एक सीमा होती है; उस क्रूर अत्याचार की तलवार की आँखों को यह संघर्ष कब शांति दिलाएगा।

विस्तार

यह शेर इंसान की क्रूरता और दर्द की सीमाओं पर सवाल उठाता है। शायर पूछ रहे हैं कि क्या टूटने की कोई हद नहीं होती? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि ظلم (oppression) की इस तेग़ (sword) के आगे, दया और रहम की सीमाएँ कब खींची गईं? यह एक गहरा सवाल है जो हमें न्याय और इंसानियत की याद दिलाता है।

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