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मरने से क्या 'मीर'-जी-साहब हम को होश थे क्या करिए
जी से हाथ उठाए गए पर उस से दिल न उठाए गए

What was there to die for, Mir-ji-sahab, were we even aware? Though they raised hands from our life, they could not lift our heart.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मरने से क्या 'मीर'-जी-साहब हम को होश थे क्या करिए। जी से हाथ उठाए गए पर उस से दिल न उठाए गए।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ मौत की बात नहीं करता, बल्कि इश्क़ की उस गहराई को बयां करता है जो रूह में बस जाती है। शायर कहते हैं कि मरने से क्या फ़र्क़ पड़ता है, जब हम पहले से ही इस मोहब्बत के होश में नहीं हैं। आप शरीर को छोड़ सकते हैं, लेकिन दिल... वो दिल तो कभी किसी से अलग नहीं हो पाता। यह इश्क़ की अमरता का बयान है।

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