“The morning, that calamity, had risen, yet you did not see it, what a deep regret. What mischiefs and troubles did the shadows of your eyelids weave together.”
सुबह वो आफ़त उठ बैठा था तुम ने न देखा, क्या सद अफ़सोस। क्या क्या फ़ितने सर जोड़े पलकों के साए साए गए। (अर्थात्, सुबह के समय एक विपत्ति खड़ी हो गई, जिसे तुमने नहीं देखा, कितना गहरा अफसोस है। तुम्हारी पलकों की परछाइयों ने कितने-कितने छल और मुसीबतें बुन डालीं।)
यह शेर बिछड़ने और अनदेखे दर्द का एहसास कराता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कह रहे हैं कि सुबह-सुबह जो आफ़त (मुसीबत) थी, वो साफ़ थी, पर तुमने नहीं देखा। उन्हें अफ़सोस है कि आपके सामने जो कितने फ़ितने थे, वो तो बस पलकों की साये से खिल उठे.... यह महबूब की बेरुखी और आशिक की गहरी पीड़ा का वर्णन है।
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
