ग़ज़ल
कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
यह ग़ज़ल प्रियजन के मन से नाराज़गी के समाप्त होने और मन में फिर से खुशी के लौटने की गुहार लगाती है। शायर पूछता है कि यह नाराजगी कब तक रहेगी, और कब मन में फिर से रौनक आ जाएगी। वह चाहता है कि प्रेम और खुशी का माहौल बन जाए।
गीत सुनें
1
कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
आह करिए कि टक हवा होवे
शायर पूछ रहा है कि आप कब तक नाराज़ रहेंगे, और कब तक यह हवा का झोंका गुज़र जाएगा।
2
जी ठहर जाए या हवा होवे
देखिए होते होते क्या होवे
चाहे व्यक्ति स्थिर रहे या हवा बन जाए, यह देखिए कि समय के साथ क्या होता है।
3
कर नमक सूद सीना-ए-मजरूह
जी में गर है कि कुछ मज़ा होवे
कर नमक सूद सीना-ए-मजरूह, जी में गर है कि कुछ मज़ा होवे। (अर्थात्, हृदय में यदि थोड़ा भी आनंद या उत्साह बाकी है, तो वह नमक, ब्याज या घायल सीने जैसा है।)
4
काहिश-ए-दिल की कीजिए तदबीर
जान में कुछ भी जो रहा होवे
अपने दिल के मामलों का ख़्याल रखो, जो भी जान में बचा हो।
5
चुप का बाइ'स है बे-तमन्नाई
कहिए कुछ भी तो मुद्दआ' होवे
चुप रहने में एक प्रकार की इच्छा की कमी है; कुछ भी कहिए ताकि मुझे कोई गुहार लगाने का मौका मिल जाए।
6
बेकली मारे डालती है नसीम
देखिए अब के साल क्या होवे
नसीम अपनी साँस से जादू कर रहा है; देखिए अब इन सालों में क्या होता है।
7
मर गए हम तो मर गए तो जी
दिल-गिरफ़्ता तिरी बला होवे
यदि हम मर जाते हैं, तो मर जाते हैं ही; हे दिल के बंदी, तुम पर विपत्ति आ जाए।
8
इश्क़ किया है दुरुस्त ऐ नासेह
जाने वो जिस का दिल-लगा होवे
अर्थ यह है कि शायर कह रहा है कि उसने प्यार किया है, हे सलाहकार। वह व्यक्ति जिसके दिल पर यह प्यार चढ़ा है, वह कोई और है।
9
फिर न शैताँ सुजूद-ए-आदम से
शायद उस पर्दे में ख़ुदा होवे
शायर कहता है कि शायद आदम के नमाज़ (सुजूद) से शैतान को कोई असर न हो, और शायद ईश्वर उस पर्दे के अंदर पाया जा सके।
10
न सुना रात हम ने इक नाला
ग़ालिबन 'मीर' मर रहा होवे
रात में हमने कोई नाला नहीं सुना, गालिब, कि तुम मर रहे हो।
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