ग़ज़ल

ऐसा तिरा रहगुज़र न होगा

ऐसा तिरा रहगुज़र न होगा

इस ग़ज़ल का भाव यह है कि प्रियतम के जीवन में कभी भी ऐसा मार्ग नहीं होगा जहाँ कोई सहारा न हो। शायर कहता है कि दुनिया की हर राह में जहां समर्थन न हो, वहाँ उसे नहीं चलना चाहिए। वह बताता है कि दुनिया की हर चीज़ एक धोखा है और वह प्रेम में किसी भी तरह की निराशा या टूटन को स्वीकार नहीं करेगा।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ऐसा तिरा रहगुज़र न होगा हर गाम पे जिस में सर न होगा
अर्थात, शायर कहता है कि ऐसा कोई रास्ता नहीं होगा जो हर जगह बिना किसी बाधा के हो।
2
क्या इन ने नशे में मुझ को मारा इतना भी तू बे-ख़बर न होगा
क्या इन्होंने नशे में मुझे मारा, या तुम इतना भी अनजान नहीं होगे।
3
धोका है तमाम बहर दुनिया देखेगा कि होंट तर न होगा
शायर कहता है कि पूरी दुनिया एक धोखा है, और यह देखेगी कि होंठ गीले नहीं होंगे।
4
आई जो शिकस्त आइने पर रू-ए-दिल यार इधर न होगा
अगर हार आईने में दिखाई देती है, तो दिल के नवाब (प्रियतम) यहाँ नहीं होंगे।
5
दशनों से किसी का इतना ज़ालिम टुकड़े टुकड़े जिगर न होगा
किसी के दशनों से इतना ज़ालिम व्यवहार नहीं होगा कि उसका जिगर टुकड़े-टुकड़े हो जाए।
6
अब दिल के तईं दिया तो समझा मेहनत-ज़दों के जिगर न होगा
अगर आपने दिल दिया है, तो समझना कि मेहनती लोगों का जिगर (दिल) नहीं होगा।
7
दुनिया की न कर तू ख़्वास्त-गारी उस से कभू बहरा-वर न होगा
दुनिया से ऐसी ख्वाहिशें मत करना, क्योंकि वह कभी भी तुम्हारी बात नहीं सुनेगा।
8
आ ख़ाना-ख़राबी अपनी मत कर क़हबा है ये उस से घर न होगा
अपनी गृहस्थी या जीवन में कोई बर्बादी मत करना, क्योंकि इसके बिना कोई घर नहीं बन सकता।
9
हो उस से जहाँ सियाह तद भी नाले में मिरे असर न होगा
हे उस से जहाँ स्याह तद भी, नाले में मेरे असर न होगा।
10
फिर नौहागरी कहाँ जहाँ में मातम-ज़दा 'मीर' अगर न होगा
फिर नौहागरी में कहाँ जहाँ में मातम-ज़दा 'मीर' अगर न होगा।
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