फिर नौहागरी कहाँ जहाँ में — मीर तक़ी मीर
फिर नौहागरी कहाँ जहाँ में
मातम-ज़दा 'मीर' अगर न होगा
“Where else, O 'Mir', will the lamentation's verse be found? If not in this sacred, mournful, poetic ground.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
फिर नौहागरी में कहाँ जहाँ में मातम-ज़दा 'मीर' अगर न होगा।
विस्तार
यह शेर सिर्फ़ ग़म की बात नहीं करता, बल्कि उस जगह की बात करता है जहाँ ग़म को जगह मिले। मीर कहते हैं कि अगर यहाँ कोई रोने वाला, कोई मातम करने वाला शायर नहीं होगा.... तो इस दुनिया में विलाप के लिए जगह ही नहीं बचेगी! यह एक गहरा एहसास है कि कला और भावना का अस्तित्व भी एक ज़िम्मेदार शख़्सियत पर निर्भर करता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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