ग़ज़ल
तड़पना भी देखा न बिस्मिल का अपने
तड़पना भी देखा न बिस्मिल का अपने
यह ग़ज़ल बिस्मिल का अपने दर्द और दर्द सहने के अंदाज़ का वर्णन करती है। इसमें शायर ने अपने जीवन के कष्टों और संघर्षों को व्यक्त किया है, साथ ही यह बताया है कि वह अपने दिल के घावों को भरने के लिए क्या कर रहा है।
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1
तड़पना भी देखा न बिस्मिल का अपने
मैं कुश्ता हूँ अंदाज़-ए-क़ातिल का अपने
मैंने न बिस्मिल का तड़प देखा है, और न अपना; मैं तो अपने ही अंदाज़ का क़ातिल हूँ।
2
न पूछो कि अहवाल ना-गुफ़्ता-बह है
मुसीबत के मारे हुए दिल का अपने
अपने मन की स्थिति का हाल पूछना नहीं, क्योंकि यह बात बिना कही ही समझी जा सकती है। जो दिल दुख से पीड़ित होता है, वह अपनी हालत कोई और को नहीं बताता।
3
दिल-ए-ज़ख़्म-ख़ुर्दा के और इक लगाई
मुदावा क्या ख़ूब घायल का अपने
ज़ख्मी दिल पर और एक चोट लगी, यह किस तरह का मरहम है जो खुद घायल के लिए लगाया गया है।
4
जो ख़ोशा था सद ख़िर्मन-ए-बर्क़ था याँ
जलाया हुआ हूँ मैं हासिल का अपने
चाहे बिजली का खजाना कभी शोभित था या नहीं, मैंने अपने ही हासिल को जला दिया है।
5
टक अबरू को मेरी तरफ़ कीजे माइल
कभू दिल भी रख लीजे माइल का अपने
कृपया अपनी नज़र मेरी तरफ़ थोड़ी झुकाएँ। कभी-कभी अपना दिल भी मेरी तरफ़ झुका हुआ रखें।
6
हुआ दफ़्तर-ए-क़ैस आख़िर अभी याँ
सुख़न है जुनूँ के अवाएल का अपने
दफ़्तर-ए-क़ैस (क़ैस का कार्यालय) आखिरकार अभी यहाँ हो गया है। क्या यह केवल अपने जुनून की शायरी की शुरुआत है।
7
बिनाएँ रखीं मैं ने आलम में क्या क्या
हूँ बंदा ख़यालात-ए-बातिल का अपने
मैंने आलम में बिना किसी महबूब के क्या-क्या चीज़ें संजोई हैं? मैं तो अपने ही झूठे खयालात में फँसा हुआ बंदा हूँ।
8
मक़ाम-ए-फ़ना वाक़िए में जो देखा
असर भी न था गोर मंज़िल का अपने
फ़ना के स्थान पर जो घटना देखी, वह अपने आप के लिए प्रिय मंजिल का कोई असर नहीं थी।
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