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बिनाएँ रखीं मैं ने आलम में क्या क्या हूँ बंदा ख़यालात-ए-बातिल का अपने

What have I kept in the world, without a beloved's presence? I am trapped in the illusions of my own thoughts.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैंने आलम में बिना किसी महबूब के क्या-क्या चीज़ें संजोई हैं? मैं तो अपने ही झूठे खयालात में फँसा हुआ बंदा हूँ।

विस्तार

यह शेर सांसारिक बंधनों और चीज़ों की नश्वरता को समझाता है। शायर कहते हैं कि इस पूरे आलम में मैंने कोई चीज़ नहीं रखी, कोई लगाव नहीं है। असलियत यह है कि मैं तो अपने ही मन के भ्रम, अपने ही ख़यालात का बंदी हूँ। यह एक गहरी आत्म-मंथन है, जो सिखाता है कि दुनिया की चिंता से कहीं ज़्यादा बड़ा ज़ंजोरा अपने भीतर का मन है।

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