ग़ज़ल

ग़ालिब कि ये दिल-ख़स्ता शब-ए-हिज्र में मर जाए

ग़ालिब कि ये दिल-ख़स्ता शब-ए-हिज्र में मर जाए

यह ग़ज़ल विरह की रात में प्रेम के भाव से मरने की इच्छा व्यक्त करती है। शायर कहता है कि यह रात उस कहानी की रात जैसी नहीं है जिसमें समय गुज़र जाए, और प्रिय की दृष्टि एक आईने की तरह है जो क्षण भर में सैंकड़ों घाव देकर मुकर जाता है। अंत में, वह कहता है कि जैसे सुबह हर दिन सूरज के साथ प्रिय के मुख पर चढ़ती है, वैसे ही यह सादा जीवन कहीं से उतर न जाए।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ग़ालिब कि ये दिल-ख़स्ता शब-ए-हिज्र में मर जाए ये रात नहीं वो जो कहानी में गुज़र जाए
शायर ग़ालिब कहते हैं कि इस विरह की दर्दनाक रात में मेरा दिल मर जाए, न कि वह रात जो किसी कहानी में बीत जाए।
2
है तुर्फ़ा मुफ़त्तिन-निगह उस आइना-रू की इक पल में करे सैंकड़ों ख़ूँ और मुकर जाए
जो लोग लापरवाही से देखते हैं, उनके नज़रों का आईना एक पल में सैकड़ों घाव दिखाता है और फिर मुकर जाता है।
3
ने बुत-कदा है मंज़िल-ए-मक़्सूद न का'बा जो कोई तलाशी हो तिरा आह किधर जाए
हे, मंज़िल तो काबा नहीं है, बल्कि तुम्हारे एहसास की याद है; जो कोई इसे तलाश करे, वह कहाँ जाएगा।
4
हर सुब्ह तो ख़ुर्शीद तिरे मुँह पे चढ़े है ऐसा न हो ये सादा कहीं जी से उतर जाए
हर सुबह सूरज तुम्हारे मुख पर चढ़ता है, बस ये सादगी कभी मेरे जीवन से न उतर जाए।
5
याक़ूत कोई उन को कहे है कोई गुल-बर्ग टुक होंट हिला तू भी कि इक बात ठहर जाए
याक़ूत से पूछो कि क्या किसी ने उसे गुल-बहार कहा है। बस होंठ हिलाकर एक बात को ठहरने दो।
6
हम ताज़ा शहीदों को न आ देखने नाज़ाँ दामन की तिरी ज़ह कहीं लोहू में न भर जाए
मैं न ताज़े शहीदों को देखने आऊँगा, न ही तेरा दामन कहीं रक्त से भर जाए।
7
गिर्ये को मिरे देख टुक इक शहर के बाहर इक सत्ह है पानी का जहाँ तक कि नज़र जाए
गिर्ये को मिरे देख टुक इक शहर के बाहर, जहाँ तक नज़र जाए, पानी का इक साथ है।
8
मत बैठ बहुत इश्क़ के आज़ुर्दा दिलों में नाला कसू मज़लूम का तासीर न कर जाए
इश्क़ से भरे हुए आज़ाद दिलों में मत बैठ, कहीं मज़लूम के दर्द का असर तुम्हारे सौंदर्य और सुकून को बिगाड़ न दे।
9
इस वरते से तख़्ता जो कोई पहुँचे किनारे तो 'मीर' वतन मेरे भी शायद ये ख़बर जाए
अगर कोई इस बहते हुए रास्ते से किनारे तक पहुँच जाए, तो मीर को लगता है कि शायद मेरे वतन की खबर भी मिल जाए।
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