ने बुत-कदा है मंज़िल-ए-मक़्सूद न का'बा — मीर तक़ी मीर
ने बुत-कदा है मंज़िल-ए-मक़्सूद न का'बा
जो कोई तलाशी हो तिरा आह किधर जाए
“O, the destination is not the Kaaba, but the memory of your sigh; where will the one who searches for it go?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
हे, मंज़िल तो काबा नहीं है, बल्कि तुम्हारे एहसास की याद है; जो कोई इसे तलाश करे, वह कहाँ जाएगा।
विस्तार
मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने यहाँ एक बहुत गहरा फ़लसफ़ा बयान किया है। शायर कहते हैं कि जीवन का असली मक़्सूद कोई भौतिक जगह नहीं है, न काबा है, न कोई मंज़िल। हमारा जो एहसास है, हमारी जो तड़प है—वह इतनी गहरी है कि उसे कहीं कोई मंज़िल नहीं मिल सकती। यह शेर बताता है कि इश्क़ की गहराई किसी भूगोल की मोहताज नहीं होती।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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