ग़ज़ल

नाले का आज दिल से फिर लब तलक गुज़र है

नाले का आज दिल से फिर लब तलक गुज़र है

यह ग़ज़ल एक गहन भावनात्मक और प्रेमपूर्ण विरह की स्थिति को दर्शाती है। शायर अपने हृदय और होंठों तक बहने वाली नाले जैसी भावना का वर्णन करते हैं, जो प्रेम में वियोग और अनिश्चितता के भावों से भरा है। यह ग़ज़ल जीवन के उतार-चढ़ावों और प्रेम की क्षणभंगुरता पर विचार करती है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
नाले का आज दिल से फिर लब तलक गुज़र है टक गोश रखियो ईधर साथ उस के कुछ ख़बर है
आज नाले से गुज़रते हुए दिल से होंठ तक का सफ़र है; मुझे इस तरफ़ ध्यान से रखना, क्योंकि उसके बारे में कुछ ख़बर है।
2
ऐ हुब्ब-ए-जाह वालो जो आज ताजवर है कल उस को देखियो तुम ने ताज है न सर है
ऐ हुब्ब-ए-जाह वालो जो आज ताजवर है, कल उस को देखियो तुम ने ताज है न सर है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हे दिखावे के प्रेम करने वालों, जो आज विजयी हैं, कल जब तुम उन्हें देखोगे तो न ताज होगा और न सिर।
3
अब की हवा-ए-गुल में सैराबी है निहायत जू-ए-चमन पे सब्ज़ा मिज़्गान-ए-चश्म-ए-तर है
अब गुलाब की हवा में बहुत अधिक नशा है; और बगीचे पर ताज़ा हरियाली आँखों का श्रृंगार है।
4
ऐ हम-सफ़ीर-ए-बे-गुल किस को दिमाग़-ए-नाला मुद्दत हुई हमारी मिंक़ार-ए-ज़ेर पर है
ऐ हम-सफ़ीर-ए-बे-गुल, किस को दिमाग़-ए-नाला? मुद्दत हुई हमारी मिंक़ार-ए-ज़ेर पर है। (अर्थात: हे हम-सफ़र, जिसके पास मन का गहरा दुख है, यह बताओ कि मुझे अनदेखा किए हुए ज़मीन पर कितना समय हो गया है।)
5
शम-ए-अख़ीर-ए-शब हूँ सन सर-गुज़श्त मेरी फिर सुब्ह होते तक तो क़िस्सा ही मुख़्तसर है
मैं रात की आखिरी साँस हूँ, मेरा सर गुज़र चुका है; सुबह होने तक कहानी ही छोटी है।
6
अब रहम पर उसी के मौक़ूफ़ है कि याँ तो नय अश्क में सरायत नय आह में असर है
अब दया उसी के पर निर्भर है कि या तो नए आँसू में शांति है या नए आह में असर है।
7
तू ही ज़माम अपनी नाके तुड़ा कि मजनूँ मुद्दत से नक़्श-ए-पा के मानिंद राह पर है
हे ज़माम, तुमने अपनी नाक क्यों तोड़ी, हे मजनूँ? बहुत समय से, यह तुम्हारे पैरों के निशान के समान रास्ते पर है।
8
हम मस्त-ए-इश्क़ वाइ'ज़ बे-हेच भी नहीं हैं ग़ाफ़िल जो बे-ख़बर हैं कुछ उन को भी ख़बर है
हम प्रेम के मद में चूर हैं, पर स्वभाव से लापरवाह नहीं हैं। जिन लोगों को कुछ पता नहीं है, हमें उन पर भी शक है कि वे जानते हैं।
9
अब फिर हमारा इस का महशर में माजरा है देखें तो उस जगह क्या इंसाफ़ दाद-गर है
अब फिर हमारा इस के महशर में क्या माजरा है, देखते हैं उस जगह क्या इंसाफ़ दाद-गर है।
10
आफ़त-रसीदा हम क्या सर खींचें उस चमन में जों नख़्ल-ए-ख़ुश्क हम को नय साया नय समर है
आपदा झेल चुके हम क्या पर्दा करें उस बाग में, जहाँ आपकी मेहरबानियों की शाखाएँ हमें न नया साया देती हैं और न नया आनंद।
11
कर 'मीर' उस ज़मीं में और इक ग़ज़ल तो मौज़ूँ है हर्फ़-ज़न क़लम भी अब तब्अ' भी इधर है
मीर, उस ज़मीन पर एक और ग़ज़ल रची गई है। अक्षर-कला और लय, दोनों अब यहाँ मौजूद हैं।
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