अब फिर हमारा इस का महशर में माजरा है — मीर तक़ी मीर

अब फिर हमारा इस का महशर में माजरा है देखें तो उस जगह क्या इंसाफ़ दाद-गर है

“Now, what a scene awaits us in this assembly, Let's see what justice that place provides.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

अब फिर हमारा इस के महशर में क्या माजरा है, देखते हैं उस जगह क्या इंसाफ़ दाद-गर है।

विस्तार

यह शेर हमें दुनियावी मोहब्बत से उठाकर, एक बहुत बड़े सवाल पर ले जाता है— हिसाब-किताब का। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि जीवन में चाहे जो भी हमारा माजरा हो, आख़िर में हमें महशर (क़यामत के दिन) में हिसाब देना है। शायर सवाल करते हैं कि उस जगह, जहाँ इंसाफ़ होगा, उसका सच क्या होगा! यह एक गहरा चिंतन है।

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