ग़ज़ल

आज-कल बे-क़रार हैं हम भी

आज-कल बे-क़रार हैं हम भी

यह ग़ज़ल बताती है कि वक्ता भी आजकल बेक़रार है, और जीवन में एक प्रकार की अस्थिरता या बेचैनी महसूस करता है। वह स्वयं को किसी के शिकार या किसी व्यवस्था का हिस्सा बताता है, जिसमें उसकी इच्छाशक्ति नहीं है। वक्ता न केवल अपनी बेचैनी व्यक्त करता है, बल्कि अपने प्रियजन से भी कोई सलाह या उपदेश न करने की विनती करता है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
आज-कल बे-क़रार हैं हम भी बैठ जा चलने हार हैं हम भी
आज-कल हम भी बेचैन हैं, और चलना भी अब एक बोझ लगता है।
2
आन में कुछ हैं आन में कुछ हैं तोह्फ़ा-ए-रोज़गार हैं हम भी
हमारे अंदर कुछ है, हमारे अंदर कुछ है, हम भी रोज़गार का तोहफ़ा हैं।
3
मन'-ए-गिर्या न कर तू ऐ नासेह इस में बे-इख़्तियार हैं हम भी
शायर से कह रहा है कि मेरे हृदय पर आँसू न बहाए, क्योंकि यह भी बेबस है।
4
दरपय-ए-जान है क़रावल मर्ग किसू के तो शिकार हैं हम भी
जीवन का पर्दा मृत्यु की कोख है, क्योंकि हम भी शिकारी के तीर का शिकार हैं।
5
नाले करियो समझ के ऐ बुलबुल बाग़ में यक कनार हैं हम भी
ऐ बुलबुल, तूने नलों को समझ लिया, पर यह जान ले कि बाग़ में हम भी एक किनारा हैं।
6
मुद्दई' को शराब हम को ज़हर आक़िबत दोस्त-दार हैं हम भी
मुद्दई को शराब हम को ज़हर, आक़िबत दोस्त-दार हैं हम भी। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जहाँ मुद्दई के लिए शराब है, वहीं हमारे लिए वह ज़हर है; और दोस्त-दार, हमारी तक़दीर भी वैसी ही है।
7
मुज़्तरिब गिर्या-नाक है ये गुल बर्क़-ए-अब्र-ए-बहार हैं हम भी
यह गुल (फूल) उदास और रोने जैसा है, और हम भी बसंत के बादल की बिजली की तरह हैं।
8
गर ज़-ख़ुद रफ़्ता हैं तिरे नज़दीक अपने तो यादगार हैं हम भी
यदि आप स्वयं अपने नज़दीक गए हैं, तो याद रखें कि हम भी एक याद हैं।
9
'मीर' नाम इक जवाँ सुना होगा उसी आशिक़ के यार हैं हम भी
जिसने 'मीर' नाम के एक शायर का ज़िक्र सुना होगा, वे जानते होंगे कि हम भी उसी आशिक़ के दोस्त हैं।
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