ग़ज़ल

गई छाँव उस तेग़ की सर से जब की

गई छाँव उस तेग़ की सर से जब की

यह ग़ज़ल एक गहन प्रेम और विरह के भाव को व्यक्त करती है, जिसमें वियोग की पीड़ा को जीवन की असहनीय धूप से उपमा दी गई है। शायर अपनी प्रेमिका के स्नेह के चले जाने पर हुए खालीपन का वर्णन करता है, और यह भी कहता है कि किसी भी बात को मुँह से निकालना मुश्किल है, जिसके लिए किसी की सहानुभूति और समझ की ज़रूरत है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
गई छाँव उस तेग़ की सर से जब की जले धूप में याँ तलक हम कि तब की
जब उस तलवार के माथे से छाँव चली गई, और धूप में जलते हुए भी हम तब तक ऐसे ही हैं।
2
पड़ी ख़िर्मन-ए-गुल पे बिजली सी आख़िर मिरे ख़ुश-निगह की निगाह इक ग़ज़ब की
गुल के बिस्तर पर बिजली की तरह पड़ी, मेरे प्रिय की सुंदर नयन-दृष्टि एक अद्भुत जादू है।
3
कोई बात निकले है दुश्वार मुँह से टक इक तो भी तो सुन किसी जाँ-ब-लब की
यदि मुँह से कोई कठिन बात निकल रही है, तो कम से कम किसी प्रियजन को उसे सुनने दो।
4
तू शमला जो रखता है ख़र है वगर्ना ज़रूरत है क्या शैख़ दम इक वजब की
अगर जो माला रखता है वह बेकार है, तो शायख़, एक वज़्न की क्या ज़रूरत है।
5
यकायक भी आ सर पे वामाँदगाँ के बहुत देखते हैं तिरी राह कब की
अचानक से, सिर पर बिखरे हुए बालों की तरह, मैंने तुम्हारी राह को कब से देखा है?
6
दिमाग़-ओ-जिगर दिल मुख़ालिफ़ हुए हैं हुई मुत्तफ़िक़ अब इधर राय सब की
मन और जिगर दिल के विरुद्ध हो गए हैं, लेकिन अब सभी की राय एक ही तरफ सहमत हो गई है।
7
तुझे क्यूँके ढूँडूँ कि सोते ही गुज़री तिरी राह में अपने पिए तलब की
मुझे तुम्हें क्यों ढूंढना, जब तुम मेरी नींद में गुज़र गई, मेरे प्रिय की राह में एक चाहत बनकर।
8
दिल अर्श से गुज़रे है ज़ोफ़ में भी ये ज़ोर-आवरी देखो ज़ारी-ए-शब की
वह दिल जो आसमान से गुज़रा है, वह यहाँ (कफ़न में भी) है। इस रात की धारा में देखो कितना ज़ोरदार जुनून है।
9
अजब कुछ है गर 'मीर' आवे मयस्सर गुलाबी शराब और ग़ज़ल अपने ढब की
अजीब बात है, 'मीर', अगर मेरा प्रियजन मेरे हिस्से की गुलाबी शराब और एक ग़ज़ल लेकर आ जाए।
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