गई छाँव उस तेग़ की सर से जब की — मीर तक़ी मीर

गई छाँव उस तेग़ की सर से जब की जले धूप में याँ तलक हम कि तब की

“When the shadow left the brow of that sword,”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

जब उस तलवार के माथे से छाँव चली गई, और धूप में जलते हुए भी हम तब तक ऐसे ही हैं।

विस्तार

यह शेर बहुत गहरे एहसास को बयां करता है। 'तेग़' यहाँ किसी सुरक्षा या सहारे का प्रतीक है, और उसकी 'छाँव' वह अस्थायी आराम है। शायर कहते हैं कि जब वह सहारा छिन जाता है, तब भी हम उस तपती हुई धूप में खड़े हैं। यह जीवन की उस सच्चाई को दिखाता है कि बाहरी सुरक्षा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंत में हमें अपनी हिम्मत और अपनी सहनशक्ति पर ही भरोसा करना पड़ता है!

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