ग़ज़ल
जुज़ जुर्म-ए-इश्क़ कोई भी साबित किया गुनाह
जुज़ जुर्म-ए-इश्क़ कोई भी साबित किया गुनाह
यह ग़ज़ल प्रेम के अपराध को किसी भी तरह से सिद्ध किया गया गुनाह मानती है। शायर बताते हैं कि महबूब की गैर-हाज़री में दिल का दर्द और यादें इतनी गहरी हैं कि वे साँझ और रात के विसाल के समय में भी एक तरह के उजाले (तुलुअ' ही ख़ुर्शीद) की तरह महसूस होती हैं। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि महबूब की एक नज़र उनके दिल में एक गहरा घाव छोड़ जाती है।
गीत सुनें
1
जुज़ जुर्म-ए-इश्क़ कोई भी साबित किया गुनाह
नाहक़ हमारी जान ली अच्छे हो वाह वाह
किसी भी इश्क़ के गुनाह को साबित किया, और हमें जान से महरूम किया; वाह वाह, आप अच्छे हो।
2
अब कैसा चाक चाक हो दिल उस के हिज्र में
गुथ्थवाँ तो लख़्त-ए-दिल से निकलती है मेरी आह
अब उस के हिज्र में दिल को कैसा दर्द होता है, जो मेरे दिल के पन्ने से धागे की तरह निकलती मेरी आह है।
3
शाम शब-ए-विसाल हुई याँ कि इस तरफ़
होने लगा तुलूअ' ही ख़ुर्शीद रू-सियाह
क्या शाम मिलन की रात बन गई है, या सूरज पश्चिम में चमकना शुरू कर रहा है।
4
गुज़रा मैं उस सुलूक से देखा न कर मुझे
बर्छी सी लाग जा है जिगर में तिरी निगाह
वह (शायर) कह रहा है कि वह उस तरीके से गुजर चुका है, इसलिए मुझे मत देखना; तुम्हारी निगाह मेरे दिल में एक छोटे से काँटे की तरह चुभ गई है।
5
दामान-ओ-जेब चाक ख़राबी-ओ-ख़स्तगी
उन से तिरे फ़िराक़ में हम ने किया निबाह
दामान-ओ-जेब से लेकर ख़राबी-ओ-ख़स्तगी तक, आपके वियोग में हमने खुद को इन चीज़ों से संभाला।
6
बेताबियों को सौंप न देना कहीं मुझे
ऐ सब्र मैं ने आन के ली है तिरी पनाह
हे सब्र, मुझे कहीं अपनी बेचैनियों को मत सौंप देना। मैं तो तुम्हारे आश्रय में धैर्य लेकर आई हूँ।
7
ख़ूँ-बस्ता बारे रहने लगी अब तो ये मिज़ा
आँसू की बूँद जिस से टपकती थी गाह गाह
यह मिजाज अब ख़ून-बस्ता (खून से भरा) हो गया है, और यह आँसू की बूँद से टपकती हुई आह गाह (दर्द) है।
8
गुल से शगुफ़्ता दाग़ दिखाता हूँ तेरे तीं
गर मुवाफ़क़त करे है तनिक मुझ से साल-ओ-माह
मैं तुम्हें गुलाब से खिला हुआ दाग दिखाता हूँ, अगर तुम मुझसे बस साल और महीने तक सहमत हो जाओ।
9
गर मना मुझ को करते हैं तेरी गली से लोग
क्यूँकर न जाऊँ मुझ को तो मरना है ख़्वा-मख़्वाह
लोग कहते हैं कि तेरी गली से गुजरते हुए मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। क्यों न जाऊँ, क्योंकि तो मरना ही है तेरे प्यार के लिए।
10
नाहक़ उलझ पड़ा है ये मुझ से तरीक़-ए-इश्क़
जाता था 'मीर' में तो चला अपनी राह राह
यह प्रेम का मार्ग मुझ से अन्यायपूर्ण रूप से उलझ गया है; मीर कहता है कि यदि मैं जाता, तो अपना रास्ता ही चुनता।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
