ग़ज़ल
गरचे कब देखते हो पर देखो
गरचे कब देखते हो पर देखो
यह ग़ज़ल प्रियतम से है, जो हर पल की सुंदरता को देखने के लिए कहता है। कवि कहता है कि जीवन में प्रेम और इच्छाएं कई तरह के दृश्य दिखाती हैं, और हर चीज़ में एक अनोखी नज़ारा है जिसे देखना ज़रूरी है। यह ग़ज़ल जीवन के क्षणिक सौंदर्य और प्रेम के गहन अनुभव पर प्रकाश डालती है।
गीत सुनें
1
गरचे कब देखते हो पर देखो
आरज़ू है कि तुम इधर देखो
मतलब है कि भले ही आप देखने की बात करते हैं, पर देखिए, मेरी आरज़ू है कि आप इधर की ओर देखें।
2
इश्क़ क्या क्या हमें दिखाता है
आह तुम भी तो इक नज़र देखो
इश्क़ क्या क्या हमें दिखाता है, ओह, तुम भी तो इक नज़र देखो।
3
यूँ अरक़ जल्वा-गर है उस मुँह पर
जिस तरह ओस फूल पर देखो
उसके मुख पर जो नशा या नशीली आभा है, वह उस फूल पर पड़ी ओस की तरह है।
4
हर ख़राश-ए-जबीं जराहत है
नाख़ुन-ए-शौक़ का हुनर देखो
हर माथे पर खरोंच एक घाव है; / चाहत की उँगलियों का हुनर देखो।
5
थी हमें आरज़ू लब-ए-ख़ंदाँ
सो एवज़ उस के चश्म-ए-तर देखो
हमें हँसने वाले के होंठों की आरज़ू थी, पर उन के आँसुओं भरे नयन देखना अधिक क़ीमती है।
6
रंग-रफ़्ता भी दिल को खींचे है
एक शब और याँ सहर देखो
रंग-रफ़्ता भी दिल को खींचे है, यह कहता है कि भले ही रंग फीके पड़ जाएं, यह दिल को खींचता है; एक और रात और एक सुबह देखने को कहती है।
7
दिल हुआ है तरफ़ मोहब्बत का
ख़ून के क़तरे का जिगर देखो
दिल मोहब्बत की तरफ़ हो गया है, और खून के क़तरे से जिगर को देखो।
8
पहुँचे हैं हम क़रीब मरने के
या'नी जाते हैं दूर अगर देखो
हम मौत के करीब आ गए हैं, या अगर हम देखें तो दूर जा रहे हैं।
9
लुत्फ़ मुझ में भी हैं हज़ारों 'मीर'
दीदनी हूँ जो सोच कर देखो
मेरे अंदर भी हज़ारों तरह की कृपाएँ हैं, ओ मीर; बस सोचकर मुझे देखना।
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