ग़ज़ल
लड़ के फिर आए डर गए शायद
लड़ के फिर आए डर गए शायद
यह ग़ज़ल एक गहरे भावनात्मक अनुभव का वर्णन करती है, जहाँ वक्ता को लगता है कि सब कुछ अस्थायी और अनिश्चित है। इसमें प्रेम, अलगाव और जीवन की नश्वरता की भावना व्यक्त की गई है, मानो सब कुछ बदल गया हो और लोग कहीं और चले गए हों।
गीत सुनें
1
लड़ के फिर आए डर गए शायद
बिगड़े थे कुछ सँवर गए शायद
शायद उन्होंने लड़कर फिर आना चाहा, पर डर गए; शायद कुछ बिगड़ा था, पर वह सँवर भी गए।
2
सब परेशाँ दिली में शब गुज़री
बाल उस के बिखर गए शायद
परेशान दिल में रात गुज़री, शायद उसके बाल बिखर गए।
3
कुछ ख़बर होती तो न होती ख़बर
सूफि़याँ बे-ख़बर गए शायद
अगर कोई खबर होती तो कोई खबर ही नहीं होती, शायद सूफी लोग बेखबर हो गए।
4
हैं मकान ओ सरा ओ जा ख़ाली
यार सब कूच कर गए शायद
मकान और सराय खाली है, और शायद मेरे सभी दोस्त कहीं चले गए हैं।
5
आँख आईना-रू छुपाते हैं
दिल को ले कर मुकर गए शायद
आँखें आईने जैसा रहस्य छुपाती हैं, शायद दिल भी उसके साथ मुकर गया।
6
लोहू आँखों में अब नहीं आता
ज़ख़्म अब दिल के भर गए शायद
आँखों में अब खून नहीं आता, शायद दिल के ज़ख्म भर गए हैं।
7
अब कहीं जंगलों में मिलते नहीं
हज़रत-ए-ख़िज़्र मर गए शायद
अब कहीं जंगलों में हज़रत-ए-ख़िज़्र नहीं मिलते, शायद वे स्वर्ग सिधार गए हैं।
8
बे-कली भी क़फ़स में है दुश्वार
काम से बाल ओ पर गए शायद
बे-कली भी क़फ़स में है दुश्वार, काम से बाल ओ पर गए शायद। इसका शाब्दिक अर्थ है कि यहाँ तक कि कली भी पिंजरे में मुश्किल में है, शायद काम (या समय) के साथ बाल और यौवन (या सुंदरता) चले गए हैं।
9
शोर बाज़ार से नहीं उठता
रात को 'मीर' घर गए शायद
शोर बाज़ार से नहीं उठता, रात को 'मीर' घर गए शायद। इसका अर्थ है कि यह (बात/रंग) शोरगुल वाले बाज़ार से नहीं उठता, शायद 'मीर' कल रात घर गए होंगे।
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