शोर बाज़ार से नहीं उठता रात को 'मीर' घर गए शायद

“Not from the noisy marketplace does it rise, 'Mir' perhaps went home last night to realize.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

शोर बाज़ार से नहीं उठता, रात को 'मीर' घर गए शायद। इसका अर्थ है कि यह (बात/रंग) शोरगुल वाले बाज़ार से नहीं उठता, शायद 'मीर' कल रात घर गए होंगे।

विस्तार

यह शेर उस दिल की तन्हाई को बयां करता है जो दुनिया के शोर से दूर है। शायर कहते हैं कि असली खामोशी बाज़ार की भीड़भाड़ से नहीं आती। वह खामोशी तो रात के वक़्त घर में आती है, जब इंसान खुद से मिलता है... और अपने अकेलेपन को महसूस करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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