ग़ज़ल
क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
यह ग़ज़ल विरह की तीव्र भावनाओं और प्रेम के दर्द को व्यक्त करती है। इसमें वियोग की आग से गले मिलने और भावनाओं के ज्वार से जल जाने का भाव है। यह प्रेम की राह में मुश्किलों और सच्चे प्रेम की निशानी के रूप में आँखों के आँसुओं को दर्शाती है।
गीत सुनें
1
क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
छातियाँ सुलगें हैं ऐसी कि जले जाते हैं
क्या कहें, मैं विरह की अग्नि से गले लगता हूँ, ऐसी कि मेरी छातियाँ जलने लगती हैं।
2
गौहर-ए-गोश किसू का नहीं जी से जाता
आँसू मोती से मिरे मुँह पे ढले जाते हैं
मेरे हृदय का अमृत मेरे प्राणों से नहीं निकलता, बल्कि मेरे आँसू मोतियों की तरह मेरे मुख पर गिरते हैं।
3
यही मसदूद है कुछ राह-ए-वफ़ा वर्ना बहम
सब कहीं नामा ओ पैग़ाम चले जाते हैं
यह ही सच्चाई है वफ़ा के रास्ते की, नहीं तो नाम और संदेश हर जगह भटक जाते हैं।
4
बार-ए-हिरमान-ओ-गुल-ओ-दाग़ नहीं अपने साथ
शजर-ए-बाग़-ए-वफ़ा फूले फले जाते हैं
हिरमान, गुल और दाग़ की महक या निशान मेरे पास नहीं हैं, जबकि वफ़ा के बाग़ के पेड़ खिलते और मुरझाते रहते हैं।
5
हैरत-ए-इश्क़ में तस्वीर से रफ़्ता ही रहे
ऐसे जाते हैं जो हम भी तो भले जाते हैं
इश्क़ के नशा में आँखें तस्वीर से भटकती हैं, लेकिन जो लोग चले जाते हैं, हम भी तो ऐसे ही चले जा सकते हैं।
6
हिज्र की कोफ़्त जो खींचे हैं उन्हीं से पूछो
दिल दिए जाते हैं जी अपने मले जाते हैं
विरह की कोफ़्त जो खींचते हैं, उन्हीं से पूछो; दिल दिए जाते हैं, और जी अपने मचल जाते हैं।
7
याद-ए-क़द में तिरे आँखों से बहें हैं जुएँ
गर किसू बाग़ में हम सर्व तले जाते हैं
याद की याद में तुम्हारी आँखों से आँसू बहते हैं, अगर हम किसी बाग़ में सब साथ घूमते हैं।
8
देखें पेश आवे है क्या इश्क़ में अब तो जूँ सैल
हम भी इस राह में सर गाड़े चले जाते हैं
देखें कि इश्क़ में अब क्या चीज़ पेश आती है, जैसे कोई पहाड़। हम भी इस रास्ते पर अपना डेरा डाल कर आगे बढ़ते जाते हैं।
9
पुर-ग़ुबारी-ए-जहाँ से नहीं सुध 'मीर' हमें
गर्द इतनी है कि मिट्टी में रुले जाते हैं
दुनिया के धूल-धूसरपन से 'मीर' हमें होश खो बैठे हैं; / हमारी गंदगी इतनी गहरी है कि हम मिट्टी में रोने लगते हैं।
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