ग़ज़ल
बे-यार शहर दिल का वीरान हो रहा है
बे-यार शहर दिल का वीरान हो रहा है
यह ग़ज़ल एक ऐसे मन की विरह-वेदना को दर्शाती है, जो प्रिय के वियोग में वीरान होता जा रहा है। कवि कहता है कि जिस तरह शहर वीरान हो रहा है, उसी तरह दिल भी खाली हो रहा है। यह वर्णन करता है कि हर चीज़—चाहे वह मैदान हो या आँखों में यार का अक्स—एक ऐसे सफ़र का हिस्सा बन रही है जो तन्हाई और बेचैनी से भरा है।
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1
बे-यार शहर दिल का वीरान हो रहा है
दिखलाई दे जहाँ तक मैदान हो रहा है
हे प्रिय, मेरा दिल वीरान होता जा रहा है। मैं देखना चाहता हूँ कि मैदान कहाँ तक फैले हुए हैं।
2
इस मंज़िल-ए-जहाँ के बाशिंदे रफ़तनी हैं
हर इक के हाँ सफ़र का सामान हो रहा है
इस दुनिया के निवासी बेचैन हैं, और हर कोई यात्रा के लिए सामान पैक कर रहा है।
3
अच्छा लगा है शायद आँखों में यार अपनी
आईना देख कर कुछ हैरान हो रहा है
शायद आँखों में अच्छा लगा है यार अपनी, आईना देखकर कुछ हैरान हो रहा है।
4
गुल देख कर चमन में तुझ को खिला ही जा है
या'नी हज़ार जी से क़ुर्बान हो रहा है
फूल देखकर बाग में तुम्हें खिला ही जा रहा है, यानी हज़ार जी से क़ुर्बान हो रहा है।
5
हाल-ए-ज़बून अपना पोशीदा कुछ न था तो
सुनता न था कि ये सैद बे-जान हो रहा है
हाल-ए-ज़बून का अपना पोशीदा कुछ नहीं था, इसलिए सुनता नहीं था कि यह सैद बे-जान हो रहा है।
6
ज़ालिम इधर की सुध ले जूँ शम-ए-सुब्ह-गाही
एक आध दम का आशिक़ मेहमान हो रहा है
ज़ालिम! मैं सुबह की रोशनी में अपना होश खो रहा हूँ, और एक आशिक़ का मेहमान बस थोड़ी देर के लिए रुका है।
7
क़ुर्बां-गह-ए-मोहब्बत वो जा है जिस में हर सू
दुश्वार जान देना आसान हो रहा है
मोहब्बत का वो बाग़ ऐसा है कि हर तरफ़ जान गंवाना आसान हो रहा है।
8
हर शब गली में उस की रोते तो रहते हो तुम
इक रोज़ 'मीर' साहब तूफ़ान हो रहा है
हर रात तुम गली में उसका रोते रहते हो, एक दिन 'मीर' साहब, तूफ़ान आ रहा है।
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