ज़ालिम इधर की सुध ले जूँ शम-ए-सुब्ह-गाही एक आध दम का आशिक़ मेहमान हो रहा है

“O cruel one, I am losing my senses with the morning light; a lover's guest is passing by for a moment.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

ज़ालिम! मैं सुबह की रोशनी में अपना होश खो रहा हूँ, और एक आशिक़ का मेहमान बस थोड़ी देर के लिए रुका है।

विस्तार

यह शेर आशिक़ की उस नाज़ुक बेचैनी को बयां करता है। शायर 'ज़ालिम' से पूछ रहे हैं कि क्या उन्हें अपनी होश-हवास छोड़ देनी चाहिए। क्यों? क्योंकि शम-ए-सुब्ह-गाही (सुबह की पहली रोशनी वाली शाम) इतनी ख़ूबसूरत है कि उन्हें खुद को एक अस्थायी, महफ़िल का मेहमान महसूस हो रहा है। यह नशा और तन्हाई का बेहतरीन संगम है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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