ग़ज़ल

गुरु बिन ज्ञान न उपजै , गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को , गुरु बिन मिटे न दोष॥

गुरु बिन ज्ञान न उपजै , गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को , गुरु बिन मिटे न दोष॥
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के इन छंदों में गुरु के परम महत्व पर जोर दिया गया है। ये बताते हैं कि गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, मोक्ष नहीं मिल सकता, सत्य को नहीं समझा जा सकता और न ही अपनी कमियों को दूर किया जा सकता है। गुरु की उपस्थिति को सभी आध्यात्मिक अंधकार को दूर करने वाली शक्ति के रूप में दर्शाया गया है, जो शिष्य को ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाती है।

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लिपि व अर्थ
1
गुरु बिन ज्ञान न उपजै , गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को , गुरु बिन मिटे न दोष॥
गुरु के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, और गुरु के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता। गुरु के बिना सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता, और गुरु के बिना दोषों का निवारण नहीं हो सकता।
2
गुरु मूरति आगे खड़ी , दुनिया भेद कछु नाहिं। उन्हीं कूँ परनाम करि , सकल तिमिर मिटि जाहिं॥
गुरु की मूर्ति के सामने, दुनिया का कोई रहस्य नहीं है। केवल उन्हीं का नाम जपने मात्र से, सारा अंधकार मिट जाता है।
3
गुरु शरणागति छाड़ि के , करै भरौसा और। सुख सम्पति की कह चली , नहीं परक ये ठौर॥
गुरु के आश्रय को त्यागकर, वह अपना विश्वास कहीं और रख देता है। वह सुख और संपत्ति की बात करता है जो इस स्थान पर नहीं हैं।
4
सिष खांडा गुरु भसकला , चढ़ै शब्द खरसान। शब्द सहै सम्मुख रहै , निपजै शीष सुजान॥
शिष्य का गुरु के तेज के प्रति आकर्षण एक तपते रेगिस्तान जैसा है। शब्द (ज्ञान) इसका सामना करता है और बुद्धिमान व्यक्ति का सिर सुरक्षित रहता है।
5
ज्ञान समागम प्रेम सुख , दया भक्ति विश्वास। गुरु सेवा ते पाइये , सद्गुरु चरण निवास॥
ज्ञान के मिलन से प्रेम, सुख, दया, भक्ति और विश्वास प्राप्त होते हैं। सच्चे गुरु की सेवा करने से सद्गुरु के चरणों का निवास प्राप्त होता है।
6
अहं अग्नि निशि दिन जरै , गुरु सो चाहे मान। ताको जम न्योता दिया , होउ हमार मेहमान॥
मैं रात और दिन की अग्नि हूँ, गुरु, जो तुम चाहो मैं वह बन जाऊँगा। मैंने यम को निमंत्रण दिया है, मैं तुम्हारा मेहमान हूँ।
7
जैसी प्रीति कुटुम्ब की , तैसी गुरु सों होय। कहैं कबीर ता दास का , पला न पकड़ै कोय॥
परिवार के प्रति जिस प्रकार की प्रीति होती है, वैसी ही प्रीति गुरु के प्रति होनी चाहिए। कबीर कहते हैं कि इस तरह का प्रेम कोई भी व्यक्ति पकड़ या बाँध नहीं सकता।
8
मूल ध्यान गुरु रूप है , मूल पूजा गुरु पाँव। मूल नाम गुरु वचन है , मूल सत्य सतभाव॥
मूल ध्यान का केंद्र गुरु का स्वरूप है, और मूल पूजा गुरु के चरण हैं। मूल नाम गुरु का वचन है, और मूल सत्य सत्व की अवस्था है।
9
पंडित पाढ़ि गुनि पचि मुये , गुरु बिना मिलै न ज्ञान। ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है , सत्त शब्द परनाम॥
हे विद्वान, गुरु की कृपा से ही ज्ञान प्राप्त होता है; गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिल सकता। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है, यह पवित्र शब्द से कही गई सत्य बात है।
10
सोइ-सोइ नाच नचाइये , जेहि निबहे गुरु प्रेम। कहै कबीर गुरु प्रेम बिन , कतहुँ कुशल नहि क्षेम॥
केवल वही नाचें जो गुरु के प्रेम को जीवित रखते हैं। कबीर कहते हैं कि गुरु प्रेम के बिना न कोई कुशलता है और न कोई कल्याण।
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गुरु बिन ज्ञान न उपजै , गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को , गुरु बिन मिटे न दोष॥ | Sukhan AI