सोइ-सोइ नाच नचाइये , जेहि निबहे गुरु प्रेम। कहै कबीर गुरु प्रेम बिन , कतहुँ कुशल नहि क्षेम॥ 453॥
“Only those who keep the Guru's love alive, let them dance. Kabir says that without the love of the Guru, there is no safety or peace.”
— कबीर
अर्थ
केवल वही नाचें जो गुरु के प्रेम को जीवित रखते हैं। कबीर कहते हैं कि गुरु प्रेम के बिना न कोई कुशलता है और न कोई कल्याण।
विस्तार
कबीर जी इस दोहे में हमें समझा रहे हैं कि जीवन की सच्ची उमंग और आनंद तभी है, जब हम गुरु के प्रति अपने प्रेम को हमेशा जीवित रखते हैं। गुरु का यह प्रेम एक राह दिखाने वाले दीपक जैसा है जो हमें हर भटकाव से बचाता है। वे कहते हैं कि इस पावन प्रेम के बिना, हमें न तो कहीं शांति मिल पाती है और न ही जीवन में कोई सुरक्षा का अनुभव होता है।
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