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गुरु शरणागति छाड़ि के , करै भरौसा और। सुख सम्पति की कह चली , नहीं परक ये ठौर॥ 446॥

Leaving the refuge of the Guru, he places his trust elsewhere. He speaks of the happiness and wealth that reside not in this place.

कबीर
अर्थ

गुरु के आश्रय को त्यागकर, वह अपना विश्वास कहीं और रख देता है। वह सुख और संपत्ति की बात करता है जो इस स्थान पर नहीं हैं।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ समझा रहे हैं कि गुरु की शरण छोड़कर, जब कोई और कहीं भरोसा ढूंढता है, तो वह सच्ची खुशी और संपत्ति से भटक जाता है। यह ऐसा है जैसे हम सही रास्ता छोड़कर, किसी अनजान राह पर अपनी मंजिल तलाश रहे हों। गुरु के मार्गदर्शन बिना मिलने वाली सांसारिक सुख-समृद्धि अक्सर भ्रमित करने वाली होती है, क्योंकि वास्तविक आनंद तो भीतर ही मिलता है, बाहरी दुनिया में नहीं।

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