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अहं अग्नि निशि दिन जरै , गुरु सो चाहे मान। ताको जम न्योता दिया , होउ हमार मेहमान॥ 449॥

I myself am the fire of night and day, O Guru, what you desire, I shall be. I have given the invitation to Yama, let me be your guest.

कबीर
अर्थ

मैं रात और दिन की अग्नि हूँ, गुरु, जो तुम चाहो मैं वह बन जाऊँगा। मैंने यम को निमंत्रण दिया है, मैं तुम्हारा मेहमान हूँ।

विस्तार

यह दोहा गहरी आध्यात्मिक साधना और पूर्ण समर्पण की बात करता है। शायर खुद को दिन-रात जलती हुई अग्नि बताते हैं, जो निरंतर तपस्या और आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक है। वे गुरु के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हैं, कहते हैं कि गुरु जैसा चाहेंगे, वे वैसा ही बन जाएँगे। अंत में, वे यमराज को भी न्योता देकर मृत्यु का निमंत्रण स्वीकार करते हैं, और खुद को उनके मेहमान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो मृत्यु के प्रति निर्भयता और जीवन के चक्र को स्वीकार करने का संकेत है।

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