“As the affection one feels for family, so should it be for the Guru. Kabir says that no one can ever truly capture (or contain) such devotion.”
परिवार के प्रति जिस प्रकार की प्रीति होती है, वैसी ही प्रीति गुरु के प्रति होनी चाहिए। कबीर कहते हैं कि इस तरह का प्रेम कोई भी व्यक्ति पकड़ या बाँध नहीं सकता।
कबीर दास जी इस दोहे में कितनी प्यारी बात कह रहे हैं! वे कहते हैं कि गुरु के लिए हमारे मन में जो प्रेम और आदर हो, वह उतना ही सच्चा और स्वाभाविक हो, जितना हमें अपने परिवार से होता है। यह कोई साधारण बंधन नहीं है, बल्कि ऐसी गहरी और शुद्ध भक्ति है जिसे कोई भी बाँध या रोक नहीं सकता। मानो यह हृदय का ऐसा विशाल सागर हो, जिसकी लहरों को कोई दामन में समेट नहीं सकता।
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