ग़ज़ल

सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार। होले-होले सुरत में , कहैं कबीर विचार॥

सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार। होले-होले सुरत में , कहैं कबीर विचार॥
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये पद ईश्वर के धीमे और निरंतर स्मरण के महत्व पर जोर देते हैं। ये सृष्टि की एकता को दर्शाते हैं, कि जब मूल स्रोत को समझ लिया जाता है, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। ये पद ईश्वरीय प्रेम के माध्यम से सांसारिक सुख-दुःख से परे जाने और गहन आध्यात्मिक अनुभूति की बात करते हैं।

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लिपि व अर्थ
1
सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार। होले-होले सुरत में , कहैं कबीर विचार॥
सुमिरन की बूंदों को ऐसे बरसाओ, जैसे एक घड़े से पानी बरसाता है। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, शायर तुम्हारे रूप में विचार करता है।
2
सब आए इस एक में , डाल-पात फल-फूल। कबिरा पीछा क्या रहा , गह पकड़ी जब मूल॥
सब कुछ, चाहे वह शाखाएं हों, पत्ते हों, फल हों या फूल, ये सब इस एक में समाहित हैं; जब कबीर ने मूल को पकड़ लिया, तो वह किसका पीछा कर रहा था।
3
जो जन भीगे रामरस , विगत कबहूँ ना रूख। अनुभव भाव न दरसते , ना दु:ख ना सुख॥
जो व्यक्ति राम के रस में भीग जाता है, उसे कभी कोई दुख नहीं होता। उसमें न सुख, न दुख, न भाव और न अनुभव दिखाई देते हैं।
4
सिंह अकेला बन रहे , पलक-पलक कर दौर। जैसा बन है आपना , तैसा बन है और॥
शेर अकेला घूम रहा है, पलक-पलक कर चक्कर लगा रहा है। जैसा आपका स्वभाव है, वैसा ही आपका अस्तित्व है।
5
यह माया है चूहड़ी , और चूहड़ा कीजो। बाप-पूत उरभाय के , संग ना काहो केहो॥
यह माया एक चूहड़ी और चूहड़ा जैसी है, जिसका अर्थ है कि यह भ्रम और मूर्खता का मिश्रण है। अतः, बाप और पुत्र (यानी, जो भी इसमें शामिल हैं) उरभाय के साथ कोई संबंध न रखें।
6
जहर की जर्मी में है रोपा , अभी खींचे सौ बार। कबिरा खलक न तजे , जामे कौन विचार॥
जहर के बीज में रोपा गया है, जिसे सौ बार खींचा जाएगा। ओ कबीर की दुनिया, जन्म और मृत्यु के चक्र से कौन मुक्ति का विचार कर सकता है।
7
जग मे बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय। यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोय॥
कवि कहते हैं कि संसार में कोई शत्रु नहीं होता, जिसके मन में शीतलता हो। यदि आप अपने अहंकार को त्याग दें, तो सभी लोग दया करेंगे।
8
जो जाने जीव न आपना , करहीं जीव का सार। जीवा ऐसा पाहौना , मिले ना दूजी बार॥
जो व्यक्ति अपना जीवन नहीं जानता, वह दूसरों के जीवन को बचाने की कोशिश करता है। ऐसा जीवन दोबारा पाना बहुत मुश्किल है।
9
कबीर जात पुकारया , चढ़ चन्दन की डार। बाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार॥
कबीर ने पुकारकर कहा, 'मैं चंदन के रास्ते पर चढ़ गया हूँ। यदि रास्ता नहीं मिला, तो फिर हम क्या करेंगे?'
10
लोग भरोसे कौन के , बैठे रहें उरगाय। जीय रही लूटत जम फिरे , मैँढ़ा लुटे कसाय॥
लोग किस पर भरोसा करके बैठे रहें, हे उरगाय। मैं तो जीकर लूटती हूँ, जंगल में घूमकर, और सामान लूटकर।
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