लोग भरोसे कौन के , बैठे रहें उरगाय। जीय रही लूटत जम फिरे , मैँढ़ा लुटे कसाय॥

“Whose trust shall the crane rest upon, dwelling in its heart? I, who live by looting, roam about, taking plunder.”

— कबीर
अर्थ

लोग किस पर भरोसा करके बैठे रहें, हे उरगाय। मैं तो जीकर लूटती हूँ, जंगल में घूमकर, और सामान लूटकर।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ सारस पक्षी के उदाहरण से समझाते हैं कि हम मनुष्य किसके भरोसे अपने मन में स्थिर बैठे रहते हैं, बाहरी चीज़ों पर निर्भर होकर। वे सवाल करते हैं कि जब संसार में हर तरफ़ लालच और माया की लूट चल रही है, जहाँ हर कोई 'कसाई' की तरह दूसरे को लूटने में लगा है, तो फिर भला ऐसे में सच्चा भरोसा किस पर किया जा सकता है? हमें अपनी आंतरिक समझ और वैराग्य पर ध्यान देना चाहिए।

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