“As if you pour water from a pitcher, remember me. Slowly, slowly, Kabir ponders in your beauty.”
सुमिरन की बूंदों को ऐसे बरसाओ, जैसे एक घड़े से पानी बरसाता है। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, शायर तुम्हारे रूप में विचार करता है।
कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि ईश्वर का सुमिरन या याद ऐसे करो, जैसे पनिहारिन घड़े से धीरे-धीरे पानी उढ़ेलती है। यह याद कोई जल्दबाजी का काम नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और लगातार होनी चाहिए। जब ऐसे लगातार और सहजता से ध्यान लगता है, तो मन खुद-ब-खुद उस याद में डूबने लगता है और हमें गहरी शांति मिलती है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति और ध्यान में धैर्य और निरंतरता कितनी ज़रूरी है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
