“Whoever is bathed in the nectar of Rama, never again is there any sorrow. Neither joy nor sorrow, nor experience or emotion are seen.”
जो व्यक्ति राम के रस में भीग जाता है, उसे कभी कोई दुख नहीं होता। उसमें न सुख, न दुख, न भाव और न अनुभव दिखाई देते हैं।
यह दोहा हमें समझाता है कि जब कोई व्यक्ति 'रामरस' यानी ईश्वर के प्रेम या भक्ति में पूरी तरह डूब जाता है, तो फिर उसे कभी कोई दुख छू नहीं सकता। 'रामरस' यहाँ उस अमृत समान दिव्य कृपा को दर्शाता है जो आत्मा को शुद्ध करती है। इस रस में भीगने के बाद, इंसान सुख-दुख, हर्ष-शोक जैसे सारे द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है और ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ कोई भी लौकिक भाव उसे प्रभावित नहीं करता, बस एक परम शांति रह जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
