जो जाने जीव न आपना , करहीं जीव का सार। जीवा ऐसा पाहौना , मिले ना दूजी बार॥ 118॥
“He who does not know his own life, attempts to salvage the life of others. Such a life is hard to find again.”
— कबीर
अर्थ
जो व्यक्ति अपना जीवन नहीं जानता, वह दूसरों के जीवन को बचाने की कोशिश करता है। ऐसा जीवन दोबारा पाना बहुत मुश्किल है।
विस्तार
कबीर दास जी इस दोहे में हमें समझाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा को या अपने असली स्वरूप को नहीं पहचानता, वह दूसरों को बचाने या उनका भला करने में लगा रहता है। यह मानव जीवन तो एक ऐसा दुर्लभ मेहमान है जो बार-बार नहीं मिलता, जैसे कोई खास मेहमान एक बार आकर चला जाए। इसलिए, पहले अपने भीतर देखना और खुद को जानना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि बिना आत्मज्ञान के दूसरों की सेवा का रास्ता अधूरा ही रहता है।
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