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ग़ज़ल

ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई

ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई

यह ग़ज़ल बताती है कि किसी के आंतरिक भावों को बाहरी रूप से तमाशा नहीं बनाया जा सकता। यह वक्ता कहता है कि जो व्यक्ति सच्चे प्रेम (इश्क़) की पराकाष्ठा पर है, उसे केवल सुंदरता (हुस्न) के चरम को देखना चाहिए, न कि किसी बाहरी प्रदर्शन का।

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1
ज़ाहिर की आँख से तमाशा करे कोई हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई
बाहरी आँख से कोई तमाशा न करे, यदि देखना ही है तो दिल की आँख से करे।
2
मंसूर को हुआ लब-ए-गोया पयाम-ए-मौत अब क्या किसी के 'इश्क़ का दा'वा करे कोई
मंसूर को लब-ए-गोया से मौत का संदेश मिला है, अब कोई किसके इश्क़ का दावा करे।
3
हो दीद का जो शौक़ तो आँखों को बंद कर है देखना यही कि देखा करे कोई
यदि तुम्हें दिव्य दर्शन का शौक है, तो अपनी आँखें बंद कर लेना; क्योंकि केवल न देख कर ही कोई वास्तव में देख सकता है।
4
मैं इंतिहा-ए-'इश्क़ हूँ तू इंतिहा-ए-हुस्न देखे मुझे कि तुझ को तमाशा करे कोई
मैं इश्क़ की चरम सीमा हूँ और तू हुस्न की चरम सीमा; अगर कोई मुझे देखेगा, तो वह तुझे ही तमाशा समझेगा।
5
'उज़्र-आफ़रीन-ए-जुर्म-ए-मोहब्बत है हुस्न-ए-दोस्त महशर में 'उज़्र-ए-ताज़ा पैदा करे कोई
प्रेम के पाप का बहाना दोस्त की सुंदरता है; क़यामत के दिन कोई नया बहाना नहीं बना सकता।
6
छुपती नहीं है ये निगह-ए-शौक़ हमनशीं फिर और किस तरह उन्हें देखा करे कोई
यह चाहत भरी निगाह छिप नहीं सकती, तो फिर कोई उन्हें और किस तरह देख पाएगा।
7
उड़ बैठे क्या समझ के भला तूर पर कलीम ताक़त हो दीद की तो तक़ाज़ा करे कोई
समझ के क्या किया कि तुम कलिमा पर बैठ गए, ऐ तूर? अगर दृष्टि की शक्ति दे दी जाए, तो कोई इसका उपयोग करने की मांग करेगा।
8
नज़ारे को ये जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ भी बार है नर्गिस की आँख से तुझे देखा करे कोई
नज़ारे को ये होंठों की हल्की सी हरकत भी एक नज़ारा है; कोई तुझे नरगिस की आँख से देखता है।
9
खिल जाएँ क्या मज़े हैं तमन्ना-ए-शौक़ में दो चार दिन जो मेरी तमन्ना करे कोई
क्या मज़ा है मेरे शौक़ की तमन्ना में, अगर कोई सिर्फ दो-चार दिन के लिए मुझे याद करे।
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