ग़ज़ल
रहा न हल्क़ा-ए-सूफ़ी में सोज़-ए-मुश्ताक़ी
रहा न हल्क़ा-ए-सूफ़ी में सोज़-ए-मुश्ताक़ी
यह ग़ज़ल सूफी प्रेम और आध्यात्मिक उत्कटता की भावना को दर्शाती है, जिसमें कवि बताता है कि सूफी घेरे में विरह की आग बुझ नहीं सकती। यह सांसारिक और धार्मिक आडंबरों की उपेक्षा करते हुए, एक ऐसे सत्य की ओर इशारा करती है जो एक दिन सब को शर्मसार कर देगा। अंत में, यह सभी भाषाओं और सीमाओं से परे, एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक अनुभव की बात करती है।
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1
रहा न हल्क़ा-ए-सूफ़ी में सोज़-ए-मुश्ताक़ी
फ़साना-हा-ए-करामात रह गए बाक़ी
सूफी महफ़िल में विरह की आग बाकी नहीं रही, बस चमत्कार की कहानियाँ बची हैं।
2
ख़राब कोशक-ए-सुल्तान ओ ख़ानक़ाह-ए-फ़क़ीर
फ़ुग़ाँ कि तख़्त ओ मुसल्ला कमाल-ए-रज़्ज़ाक़ी
सुल्तान का खजाना और फकीर की खानगाह, दोनों ही तख़्त और मुसल्ला रज़्ज़ाक़ी के कमाल हैं।
3
करेगी दावर-ए-महशर को शर्मसार इक रोज़
किताब-ए-सूफ़ी-ओ-मुल्ला की सादा-औराक़ी
एक दिन यह सूफी और मुल्ला की किताब के सादे पन्नों से क़यामत के दरवाज़े को शर्मसार कर देगी।
4
न चीनी ओ अरबी वो न रूमी ओ शामी
समा सका न दो आलम में मर्द-ए-आफ़ाक़ी
न चीनी और न अरबी, न रूमी और न शम्मी, दो आलम में आफाकी मर्द को वश में कर सका।
5
मय-ए-शबाना की मस्ती तो हो चुकी लेकिन
खटक रहा है दिलों में करिश्मा-ए-साक़ी
रात के नशीले मय (शराब) का प्रभाव तो हो गया है, लेकिन अभी भी साक़ी का जादू हमारे दिलों में चुभ रहा है।
6
चमन में तल्ख़-नवाई मिरी गवारा कर
कि ज़हर भी कभी करता है कार-ए-तिर्याक़ी
चमन में तल्ख़-नवाई मेरी गवारा कर, कि ज़हर भी कभी करता है कार-ए-तिर्याक़ी। अर्थात्, मेरे मन की कड़वाहट को स्वीकार कर लेना, क्योंकि ज़हर भी कभी-कभी जीवन देने वाले औषधि का काम करता है।
7
अज़ीज़-तर है मता-ए-अमीर-ओ-सुल्ताँ से
वो शेर जिस में हो बिजली का सोज़-ओ-बर्राक़ी
अमीर और सुल्तान के मतों से जो शेर में बिजली की चमक और तेज हो, वह अधिक प्रिय है।
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