ख़राब कोशक-ए-सुल्तान ओ ख़ानक़ाह-ए-फ़क़ीर फ़ुग़ाँ कि तख़्त ओ मुसल्ला कमाल-ए-रज़्ज़ाक़ी

“Oh, poor treasury of the Sultan, and the khanqah of the faqir, Are the thrones and the prayer mats but the wonders of the Almighty?”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

सुल्तान का खजाना और फकीर की खानगाह, दोनों ही तख़्त और मुसल्ला रज़्ज़ाक़ी के कमाल हैं।

विस्तार

यह शेर अल्लामा इकबाल साहब की गहरी सोच को दर्शाता है। यहाँ सुल्तान का महल दुनियावी ताकत और ऐश्वर्य का प्रतीक है, जबकि फकीर की खानक़ाह सादगी और अध्यात्म का। शायर कहते हैं कि असली, रज़्ज़ाक़ी (रज़क देने वाली) की कमाल.... न तो तख़्त पर है और न ही महल में! वह तो बस एक सादे से मुसल्ला पर होती है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा नूर और शक्ति कहाँ है।

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