ग़ज़ल

रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़

رشک کہتا ہے کہ اس کا غیر سے اخلاص حیف

यह ग़ज़ल प्रेमी के मन में ईर्ष्या और तर्क के बीच चलने वाले द्वंद्व को दर्शाती है, जहाँ महबूब की दूसरों से नज़दीकी दिल में रश्क जगाती है तो अक़्ल उसकी बेवफ़ाई की असलियत याद दिलाती है। ग़ालिब ने इसमें प्रेम की विवशता के साथ-साथ संसार की मायावी और परिवर्तनशील प्रकृति पर गहरा दार्शनिक चिंतन प्रस्तुत किया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़ अक़्ल कहती है कि वो बे-मेहर किस का आश्ना
ईर्ष्या कहती है कि अफ़सोस की बात है कि महबूब का प्रतिद्वंद्वी से सच्चा लगाव है, जबकि बुद्धि समझाती है कि वह बेरहम इंसान भला किसी का सच्चा दोस्त कैसे हो सकता है।
2
ज़र्रा ज़र्रा साग़र-ए-मै-ख़ाना-ए-नै-रंग है गर्दिश-ए-मजनूँ ब-चश्मक-हा-ए-लैला आश्ना
इस तिलिस्मी दुनिया का हर एक ज़र्रा शराब के प्याले जैसा है, और मजनूँ का चक्कर काटना लैला की आँखों के इशारों से पूरी तरह वाक़िफ़ है।
3
शौक़ है सामाँ-तराज़-ए-नाज़िश-ए-अरबाब-ए-अज्ज़ ज़र्रा सहरा-दस्त-गाह ओ क़तरा दरिया-आश्ना
शौक़ बेबस और आजिज़ लोगों के लिए गर्व का सामान जुटाता है, जिसके सबब एक मामूली ज़र्रा रेगिस्तान पर हुकूमत पाता है और एक क़तरा दरिया से आशना हो जाता है।
4
मैं और एक आफ़त का टुकड़ा वो दिल-ए-वहशी कि है आफ़ियत का दुश्मन और आवारगी का आश्ना
एक तरफ़ मैं हूँ और दूसरी तरफ़ आफ़त का टुकड़ा मेरा वह वहशी दिल है, जो चैन व सलामती का दुश्मन है और आवारागर्दी का साथी है।
5
शिकवा-संज-ए-रश्क-ए-हम-दीगर न रहना चाहिए मेरा ज़ानू मोनिस और आईना तेरा आश्ना
हमें एक-दूसरे से ईर्ष्या की शिकायत नहीं रखनी चाहिए; मेरा घुटना मेरा साथी है और आईना तुम्हारा दोस्त है।
6
कोहकन नक़्क़ाश-ए-यक-तिम्साल-ए-शीरीं था 'असद' संग से सर मार कर होवे न पैदा आश्ना
असद, कोहकन (फ़रहाद) सिर्फ़ शीरीं की एक मूरत तराशने वाला नक़्क़ाश था; पत्थरों से सिर फोड़ कर कोई सच्चा महबूब पैदा नहीं हो सकता।
7
ख़ुद-परस्ती से रहे बाहम-दिगर ना-आश्ना बेकसी मेरी शरीक आईना तेरा आश्ना
अपनी-अपनी ख़ुद-परस्ती के कारण हम एक-दूसरे से अनजान ही रहे; बेबसी मेरी साथी बनी रही और आईना तुम्हारा दोस्त रहा।
8
आतिश-ए-मू-ए-दिमाग़-ए-शौक़ है तेरा तपाक वर्ना हम किस के हैं ऐ दाग़-ए-तमन्ना आश्ना
तुम्हारी गर्मजोशी और तपाक हमारे शौक़ की रगों को सुलगा देता है, वरना ऐ तमन्ना के दाग़, हम आख़िर किसके अपने या वाक़िफ़ हैं?
9
जौहर-ए-आईना जुज़ रम्ज़-ए-सर-ए-मिज़गाँ नहीं आश्ना की हम-दिगर समझे है ईमा आश्ना
आईने का जौहर पलकों के इशारे के सिवा कुछ नहीं है; एक परिचित ही दूसरे परिचित के गुप्त इशारों को समझता है।
10
रब्त-ए-यक-शीराज़ा-ए-वहशत हैं अजज़ा-ए-बहार सब्ज़ा बेगाना सबा आवारा गुल ना-आश्ना
वसंत के सारे तत्व पागलपन के एक ही सूत्र में बंधे हुए हैं; हरियाली बेगानी है, सुबह की हवा आवारा भटक रही है और फूल अनजान है।
11
बे-दिमाग़ी शिकवा-संज-ए-रश्क-ए-हम-दीगर नहीं यार तेरा जाम-ए-मय ख़म्याज़ा मेरा आश्ना
मेरी उदासी आपसी ईर्ष्या की कोई शिकायत नहीं करती। ऐ दोस्त, शराब का प्याला तुम्हारा साथी है और जम्हाई (बेचैनी/थकान) मेरी साथी है।
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