Sukhan AI
ग़ज़ल

नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में

نہیں ہے زخم کوئی بخیے کے درخور مرے تن میں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 13 shers· radif: में

यह ग़ज़ल गहरे दुःख और ऐसे अटूट ज़ख़्मों का चित्रण करती है, जो इतने गहरे हैं कि उन्हें भरा नहीं जा सकता। शायर निराशा की एक ऐसी अवस्था व्यक्त करता है जहाँ अतीत के कष्टों के अवशेष किसी भी आनंद या प्रकाश को अवरुद्ध कर देते हैं। इस व्यापक अंधकार के बावजूद, महबूब का सार उनके अस्तित्व के हर हिस्से में अविभाज्य रूप से अंकित है, जो अक्सर यह दर्शाता है कि यह प्रेम ही ऐसे तीव्र, विनाशकारी दर्द का स्रोत है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में हुआ है तार-ए-अश्क-ए-यास रिश्ता चश्म-ए-सोज़न में
मेरे शरीर में कोई ऐसा घाव नहीं है जो सिलाई के योग्य हो। निराशा के आँसुओं का धागा ही सुई के छेद में पिरोया हुआ धागा बन गया है।
2
हुई है माने-ए-ज़ौक़-ए-तमाशा ख़ाना-वीरानी कफ़-ए-सैलाब बाक़ी है ब-रंग-ए-पुम्बा रौज़न में
मेरे घर की बर्बादी देखने के आनंद में बाधा बन गई है, जैसे सैलाब का झाग रोशनदान में रुई की तरह बाकी है।
3
वदीअत-ख़ाना-ए-बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ हूँ नगीन-ए-नाम-ए-शाहिद है मिरे हर क़तरा-ए-ख़ूँ तन में
मैं पलकों की क्रूर खोजों का अमानत घर हूँ। मेरे शरीर में खून की हर बूँद पर प्रेयसी का नाम एक नगीने की तरह अंकित है।
4
बयाँ किस से हो ज़ुल्मत-गुस्तरी मेरे शबिस्ताँ की शब-ए-मह हो जो रख दूँ पुम्बा दीवारों के रौज़न में
मैं अपने शबिस्ताँ के गहन अंधकार का वर्णन किससे करूँ? यह अंधकार इतना गहरा है कि यदि मैं पूर्णिमा की रात को भी दीवारों के सभी रौज़नों (छिद्रों) को रूई से बंद कर दूँ, जहाँ से प्रकाश आ सकता है, तो भी वह इस अंधकार की व्यापकता को बयाँ नहीं कर पाएगा।
5
निकोहिश माना-ए-बे-रब्ती-ए-शोर-ए-जुनूँ आई हुआ है ख़ंदा-ए-अहबाब बख़िया जेब-ओ-दामन में
मेरे पागलपन की आवाज़ के बेतुके अर्थ पर निंदा आई। मेरे दोस्तों की हँसी मेरे गिरेबान और दामन के फटे हुए हिस्सों के लिए टाँके बन गई है।
6
हुए उस मेहर-वश के जल्वा-ए-तिमसाल के आगे पर-अफ़्शाँ जौहर आईने में मिस्ल-ए-ज़र्रा रौज़न में
उस सूरज-मुख प्रिय की भव्य छवि के सामने, दर्पण का जौहर रोशनदान में एक धूल के कण की तरह फड़फड़ाने लगा।
7
न जानूँ नेक हूँ या बद हूँ पर सोहबत-मुख़ालिफ़ है जो गुल हूँ तो हूँ गुलख़न में जो ख़स हूँ तो हूँ गुलशन में
मैं नहीं जानता कि मैं नेक हूँ या बद हूँ, पर मेरी संगत हमेशा प्रतिकूल रहती है। यदि मैं फूल हूँ तो आग के ढेर में हूँ, और यदि मैं तिनका हूँ तो बगीचे में हूँ।
8
हज़ारों दिल दिये जोश-ए-जुनून-ए-इश्क़ ने मुझ को सियह हो कर सुवैदा हो गया हर क़तरा-ए-ख़ूँ तन में
इश्क़ के जुनून और जोश ने मुझे हज़ारों दिल दिए। मेरे शरीर में ख़ून की हर बूँद काली होकर दिल का सुवैदा बन गई।
9
'असद' ज़िंदानी-ए-तासीर-ए-उल्फ़त-हा-ए-ख़ूबाँ हूँ ख़म-ए-दस्त-ए-नवाज़िश हो गया है तौक़ गर्दन में
असद, मैं सुंदर लोगों के प्रेम के प्रभाव का बंदी हूँ। कृपा भरे हाथ का घुमाव मेरी गर्दन में बेड़ी बन गया है।
10
फ़ुज़ूँ की दोस्तों ने हिर्स-ए-क़ातिल ज़ौक़-ए-कुश्तन में होए हैं बख़िया-हा-ए-ज़ख़्म जौहर तेग़-ए-दुश्मन में
दोस्तों ने क़ातिल की हत्या करने की लालच को और बढ़ा दिया। मेरे ज़ख़्मों के टाँके दुश्मन की तलवार के जौहर बन गए हैं।
11
तमाशा करदनी है लुत्फ़-ए-ज़ख़्म-ए-इंतिज़ार ऐ दिल सुवैदा दाग़-ए-मर्हम मर्दुमुक है चश्म-ए-सोज़न में
ऐ दिल, इंतज़ार के ज़ख़्म का आनंद देखने लायक है। सुई के छेद में जो पुतली है, वह मरहम का एक काला निशान मात्र है।
12
दिल-ओ-दीन-ओ-ख़िरद ताराज-ए-नाज़-ए-जल्वा-पैराई हुआ है जौहर-ए-आईना ख़ेल-ए-मोर ख़िर्मन में
मेरा दिल, धर्म और बुद्धि उसकी सुंदरता के नाज़ से बर्बाद हो गए हैं। मेरा अंतरंग (दर्पण का जौहर) ऐसा हो गया है जैसे खलिहान में चींटियों का खेल।
13
निकोहिश माने-ए-दीवानगी-हा-ए-जुनूँ आई लगाया ख़ंदा-ए-नासेह ने बख़िया जेब-ओ-दामन में
तिरस्कार और नसीहत देने वाले की हँसी ने जुनून की दीवानगी को रोक दिया, मानो उसने मेरे वस्त्रों के गिरेबान और दामन को सील दिया हो।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.

नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में | Sukhan AI