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बयाँ किस से हो ज़ुल्मत-गुस्तरी मेरे शबिस्ताँ की
शब-ए-मह हो जो रख दूँ पुम्बा दीवारों के रौज़न में

To whom can I describe the vastness of my chamber's gloom so deep?Even if on a moonlit night, I plug all wall-vents where light may creep.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मैं अपने शबिस्ताँ के गहन अंधकार का वर्णन किससे करूँ? यह अंधकार इतना गहरा है कि यदि मैं पूर्णिमा की रात को भी दीवारों के सभी रौज़नों (छिद्रों) को रूई से बंद कर दूँ, जहाँ से प्रकाश आ सकता है, तो भी वह इस अंधकार की व्यापकता को बयाँ नहीं कर पाएगा।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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