ग़ज़ल
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
جب تک دہان زخم نہ پیدا کرے کوئی
इस ग़ज़ल में ग़ालिब ने महबूब से संवाद स्थापित करने के लिए आवश्यक पीड़ा और आत्म-समर्पण का मार्मिक चित्रण किया है, जहाँ अभिव्यक्ति केवल ज़ख़्मों के ज़रिए ही संभव होती है। वे दुनिया भर में फैली दीवानगी और दर्द को दर्शाते हुए प्रेम की जटिलताओं और अस्तित्व की गहरी बेचैनी को रेखांकित करते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
मुश्किल कि तुझ से राह-ए-सुख़न वा करे कोई
जब तक कोई अपने ज़ख़्म का मुँह न खोले, तब तक किसी के लिए भी आपसे बातचीत का रास्ता निकालना नामुमकिन या बहुत मुश्किल है।
2
आलम ग़ुबार-ए-वहशत-ए-मजनूँ है सर-ब-सर
कब तक ख़याल-ए-तुर्रा-ए-लैला करे कोई
पूरी दुनिया शुरू से आखिर तक मजनूँ के पागलपन की धूल में डूबी हुई है, ऐसे में कोई कब तक लैला की ज़ुल्फ़ों का ख़याल करता रहे?
3
अफ़्सुर्दगी नहीं तरब-इंशा-ए-इल्तिफ़ात
हाँ दर्द बन के दिल में मगर जा करे कोई
उदासी किसी की तवज्जो और इनायत की ख़ुशी पैदा नहीं करती; हाँ, कोई चाहे दर्द बनकर ही सही, दिल में जगह तो बनाए।
4
रोने से ऐ नदीम मलामत न कर मुझे
आख़िर कभी तो उक़्दा-ए-दिल वा करे कोई
ऐ दोस्त, मेरे रोने पर मुझे बुरा-भला मत कह, आख़िर कभी तो इंसान को अपने दिल की गाँठ खोलनी ही पड़ती है।
5
चाक-ए-जिगर से जब रह-ए-पुर्सिश न वा हुई
क्या फ़ाएदा कि जैब को रुस्वा करे कोई
जब दिल के ज़ख़्म से भी किसी के हाल-चाल पूछने का रास्ता न खुला, तो फिर अपना गिरेबान फाड़कर ख़ुद को ज़लील या रुसवा करने का क्या फ़ायदा?
6
लख़्त-ए-जिगर से है रग-ए-हर-ख़ार शाख़-ए-गुल
ता चंद बाग़-बानी-ए-सहरा करे कोई
मेरे जिगर के खून से हर कांटे की रग गुलाब की डाल बन गई है; कोई कब तक वीरान रेगिस्तान की बाग़बानी करता रहे?
7
नाकामी-ए-निगाह है बर्क़-ए-नज़ारा-सोज़
तू वो नहीं कि तुझ को तमाशा करे कोई
तुझे देखने में नज़र की विफलता उस बिजली की तरह है जो दृष्टि को ही भस्म कर देती है; तू ऐसा नहीं है जिसे कोई तमाशा बना सके।
8
हर संग ओ ख़िश्त है सदफ़-ए-गौहर-ए-शिकस्त
नुक़साँ नहीं जुनूँ से जो सौदा करे कोई
हर पत्थर और ईंट टूटने के मोती की सीप के समान है, इसलिए जो कोई दीवानगी का सौदा करता है उसे कोई नुक़सान नहीं होता।
9
सर बर हुई न वादा-ए-सब्र-आज़मा से उम्र
फ़ुर्सत कहाँ कि तेरी तमन्ना करे कोई
सब्र का इम्तिहान लेने वाले वादे के साथ ही ज़िंदगी पूरी न हो सकी, अब इतनी फ़ुर्सत कहाँ बची है कि कोई तुम्हारी तमन्ना करे।
10
है वहशत-ए-तबीअत-ए-ईजाद यास-खेज़
ये दर्द वो नहीं कि न पैदा करे कोई
नई बातें सोचने वाले स्वभाव का पागलपन निराशा पैदा करता है, फिर भी यह ऐसा दर्द नहीं है जिसे कोई अपने भीतर पैदा न करे।
11
बेकारी-ए-जुनूँ को है सर पीटने का शुग़्ल
जब हाथ टूट जाएँ तो फिर क्या करे कोई
दीवानेपन की बेकारी का काम अपना सिर पीटना है, लेकिन जब हाथ ही टूट जाएँ तो फिर कोई क्या कर सकता है?
12
हुस्न-ए-फ़रोग़-ए-शम्मा-ए-सुख़न दूर है 'असद'
पहले दिल-ए-गुदाख़्ता पैदा करे कोई
ऐ असद, शायरी की शमा का चमकता हुआ हुस्न तो अभी बहुत दूर है; पहले किसी को अपने अंदर पिघलने वाला संवेदनशील दिल पैदा करना चाहिए।
13
वहशत कहाँ कि बे-ख़ुदी इंशा करे कोई
हस्ती को लफ़्ज़-ए-मानी-ए-अन्क़ा करे कोई
ऐसी दीवानगी और वहशत कहाँ कि कोई बे-ख़ुदी की रचना कर सके, या अपने अस्तित्व को ऐसा शब्द बना दे जिसका अर्थ 'अनक़ा' पक्षी की तरह केवल नाममात्र या अस्तित्वहीन हो।
14
जो कुछ है महव-ए-शोख़ी-ए-अबरू-ए-यार है
आँखों को रख के ताक़ पे देखा करे कोई
जो कुछ भी मौजूद है, वह महबूब की भौंहों की शोख़ी में लीन है; अब कोई अपनी आँखों को ताक़ पर रखकर दीदार करे।
15
अर्ज़-ए-सरिश्क पर है फ़ज़ा-ए-ज़माना तंग
सहरा कहाँ कि दावत-ए-दरिया करे कोई
मेरे बहते आँसुओं के सामने दुनिया का विस्तार बहुत तंग है; अब ऐसा रेगिस्तान कहाँ बचा है जो किसी दरिया की मेज़बानी कर सके?
16
वो शोख़ अपने हुस्न पे मग़रूर है 'असद'
दिखला के उस को आइना तोड़ा करे कोई
ऐ असद, वह चंचल महबूब अपने हुस्न पर बहुत घमंड करता है; किसी को चाहिए कि उसे आईना दिखाए और फिर उसे तोड़ दे।
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