अर्ज़-ए-सरिश्क पर है फ़ज़ा-ए-ज़माना तंग — मिर्ज़ा ग़ालिब
“Too narrow is the world's expanse to hold the torrent of my tears; where is a desert vast enough to play host to a river?”
अर्थ
मेरे बहते आँसुओं के सामने दुनिया का विस्तार बहुत तंग है; अब ऐसा रेगिस्तान कहाँ बचा है जो किसी दरिया की मेज़बानी कर सके?
विस्तार
ग़ालिब यहाँ अपने दर्द की बेपनाह शिद्दत को बड़ी नफ़ासत से बयान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उनके आँसू महज़ बूँदें नहीं बल्कि एक उफनता हुआ दरिया हैं, जिसके आगे यह सारी दुनिया भी तंग पड़ गई है। अफ़सोस यह है कि ज़माने में ऐसा कोई वसीह सहरा (रेगिस्तान) मौजूद ही नहीं, जो इस उमड़ते दरिया-ए-अश्क की मेज़बानी कर सके और उसे अपने दामन में समेट ले।
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