नाकामी-ए-निगाह है बर्क़-ए-नज़ारा-सोज़ — मिर्ज़ा ग़ालिब

नाकामी-ए-निगाह है बर्क़-ए-नज़ारा-सोज़ तू वो नहीं कि तुझ को तमाशा करे कोई

“The gaze's failure is a lightning that consumes all sight; / You are not one whom anyone could turn into a spectacle.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

तुझे देखने में नज़र की विफलता उस बिजली की तरह है जो दृष्टि को ही भस्म कर देती है; तू ऐसा नहीं है जिसे कोई तमाशा बना सके।

विस्तार

ग़ालिब यहाँ एक ऐसे हुस्न या हक़ीक़त की बात कर रहे हैं, जो हमारी आम नज़रों की पहुँच से बहुत परे है। जब हमारी निगाह उस जमाल को समेटने में नाकाम होती है, तो यह नाकामी एक ऐसी बिजली बनकर गिरती है जो देखने की हर कोशिश को ही भस्म कर देती है। महबूब कोई बाज़ार का तमाशा या नुमाइश नहीं जिसे यूँ ही देख लिया जाए; उस का नूर तो देखने वाले को पूरी तरह अवाक और बेबस कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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