रोने से ऐ नदीम मलामत न कर मुझे — मिर्ज़ा ग़ालिब

रोने से ऐ नदीम मलामत न कर मुझे आख़िर कभी तो उक़्दा-ए-दिल वा करे कोई

“Reproach me not, O companion, for weeping; after all, at some point, one must untie the knot of the heart.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

ऐ दोस्त, मेरे रोने पर मुझे बुरा-भला मत कह, आख़िर कभी तो इंसान को अपने दिल की गाँठ खोलनी ही पड़ती है।

विस्तार

इस शेर में शायर अपने करीबी दोस्त यानी नदीम से गुज़ारिश करता है कि वह उसे रोने पर टोके या शर्मिंदा न करे। यहाँ 'उक़्दा-ए-दिल' यानी दिल की गाँठ का बहुत संवेदनशील रूपक बाँधा गया है, जो अंदर दबे हुए रंज और घुटन को दर्शाता है। आँसू बहाना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि दिल में फँसी उस दुख की गाँठ को खोलकर राहत पाने का एक कुदरती ज़रिया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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