सर बर हुई न वादा-ए-सब्र-आज़मा से उम्र — मिर्ज़ा ग़ालिब

सर बर हुई न वादा-ए-सब्र-आज़मा से उम्र फ़ुर्सत कहाँ कि तेरी तमन्ना करे कोई

“Life could not outlast the promise that put my patience to the test; where is the leisure left for anyone to yearn for you?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

सब्र का इम्तिहान लेने वाले वादे के साथ ही ज़िंदगी पूरी न हो सकी, अब इतनी फ़ुर्सत कहाँ बची है कि कोई तुम्हारी तमन्ना करे।

विस्तार

शायर यहाँ महबूब के उस इम्तिहान लेने वाले वादे का दर्द बयां कर रहा है, जिसके इंतज़ार में पूरी ज़िंदगी ही बीत गई। सब्र की यह आज़माइश इतनी लंबी चली कि उम्र तमाम हो गई, लेकिन वह वादा वफ़ा न हुआ। अब जब ज़िंदगी ही ख़त्म होने को है, तो शायर बेबसी और हल्के से तंज़ के साथ कहता है कि अब किसी के पास दोबारा तुम्हारी आरज़ू करने की फ़ुर्सत और मोहलत ही कहाँ बची है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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