ग़ज़ल
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
غم نہیں ہوتا ہے آزادوں کو بیش از یک نفس
यह ग़ज़ल आज़ाद और विरक्त रूहों की बेनियाज़ी को दर्शाती है, जिनके लिए ग़म एक सांस से ज़्यादा नहीं ठहरता और जो विपत्ति के अंधेरे को भी हौसले से रोशन करते हैं। इसमें सांसारिक बंधनों से मुक्ति, दार्शनिक वैराग्य और जीवन के मायावी स्वरूप को बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम
आज़ाद तबीयत लोगों को एक सांस से ज़्यादा देर तक ग़म नहीं रहता; हम अपने मातम-ख़ाने की शम्अ बिजली की चमक से रौशन करते हैं।
2
महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल
हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम
कल्पना रूपी ताश का खिलाड़ी महफ़िलों को तितर-बितर कर देता है; हम केवल एक बुतख़ाने के तिलिस्म के पन्ने पलटने के समान हैं।
3
बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं
हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम
अंदर एक पूरी दुनिया भर का तूफ़ान और हलचल होने के बावजूद कोई शोर बाहर ज़ाहिर नहीं होता; हम परवाने के दिल की ख़्वाबगाह के दीयों की रौशनी की तरह ख़ामोश हैं।
4
ज़ोफ़ से है ने क़नाअत से ये तर्क-ए-जुस्तुजू
हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम
हमने तलाश की कोशिश को न तो कमज़ोरी के कारण छोड़ा है और न ही संतोष की वजह से, बल्कि हम तो मर्दाना हिम्मत के सहारे पर एक बोझ बन गए हैं।
5
दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद'
जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम
ऐ असद, इसमें लाखों तमन्नाएँ हमेशा के लिए क़ैद हैं, इसलिए हम अपने ख़ून से भरे सीने को एक क़ैदख़ाना समझते हैं।
6
बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम
मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम
हम मयखाने के हर मोड़ और कोने में इस कदर मदहोश हैं कि सुराही में आई बाल बराबर दरार को भी जाम पर बनी नाप की लकीर समझ बैठते हैं।
7
बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ'
पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम
चूँकि बिखरे हुए बालों का हर एक तार रोशनी की किरण की तरह है, इसलिए हमने सूरज की किरणों को बालों में कंघी करने वाला हाथ समझ लिया।
8
मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल
आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम
अपने-आप को भुला देने (बे-ख़ुदी) के निरंतर अभ्यास से हम कल्पना के चमन में बेगाने सब्ज़े (अजनबी घास) के ख़्वाब की ताबीर से भली-भाँति वाक़िफ़ हो चुके हैं।
9
फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में
जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम
महबूब की जुदाई की रातों में अत्यधिक रतजगे के कारण हम मोमबत्ती की लौ की तरह हो गए हैं, जो अपनी ही गर्म दास्तान के जलने का दाग़ बनी हुई है।
10
शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से
पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम
ग़म की शाम में, महबूब के दहकते रुख़सार के इश्क़ की तपन से, हम परवाने की तरह जलते हुए अपने पंख फड़फड़ा रहे हैं।
11
हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए
दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम
अपनी इच्छा व्यक्त करने की तड़प को हमारी हालत से समझना चाहिए; कंघी के समान हम दोनों जहानों में सूखी ज़बानों का एक मजमा बने हुए हैं।
12
कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं
आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम
दुनिया की कश्ती को उपेक्षा के तूफ़ान के हवाले कर दो, क्योंकि हम तो केवल एक अफ़साने के पिघले हुए पानी जैसे सार हैं।
13
वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ
नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव की बेतरतीब उलझन और दहशत के बारे में मत पूछिए। किसी दीवाने के सिर के बिखरे बालों की तरह हमारा बढ़ना और मौजूद होना ही शर्मिंदगी की बात है।
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