“For God's sake, O ascetic, lift not the veil of the Kaaba / Lest here too, that very same infidel idol should appear.”
हे तपस्वी, ईश्वर के लिए काबा का पर्दा मत उठाओ; कहीं ऐसा न हो कि यहाँ भी वही काफ़िर महबूब (सनम) निकल आए।
शायर यहाँ ज़ाहिद यानी धर्म के पाखंडी पहरेदार से एक प्यारी सी चुटकी ले रहा है। वह कहता है कि काबे के पाक पर्दे को मत उठाओ, कहीं ऐसा न हो कि उस पवित्र जगह के भीतर भी वही हमारा काफ़िर महबूब नज़र आ जाए जिसकी सूरत दिल में बसी है। यह शेर इश्क़ और इबादत की लकीर को मिटाते हुए यह गहरा सच बयां करता है कि सच्चे आशिक़ के लिए कायनात के हर ज़र्रे में सिर्फ़ उसके महबूब का ही नूर झलकता है।
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